श्योपुर जिले में प्रशासनिक व्यवस्था की एक बड़ी गड़बड़ी सामने आई है, जहां जीवनयापन के लिए बांटी गई सरकारी पट्टे की जमीनों को बेचने के नाम पर करोड़ों रुपये का फर्जीवाड़ा किया गया है। कलेक्टोरेट के पास और मुख्य हाईवे से सटी चार बेशकीमती जमीनों के सौदे को लेकर राजस्व महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। इन जमीनों को बेचने के लिए स्थानीय स्तर पर रोक लगाई गई थी, लेकिन उच्च स्तर से अनुमति मिलने के बाद इनकी रजिस्ट्रियां भी पूरी कर ली गईं।
कागजों में बंजर और मौके पर लहलहाती धान की फसल
पड़ताल में इस बात का खुलासा हुआ है कि जिन जमीनों को सरकारी दस्तावेजों में 'असिंचित और कमजोर पैदावार' वाली बताकर बेचने की मजबूरी दिखाई गई थी, असलियत में वहां मौके पर धान की फसल खड़ी हुई है। बाजार में चार करोड़ रुपये से अधिक की कीमत वाली इन जमीनों का सौदा कागजों में बेहद कम दामों में तय कर दिया गया। पट्टाधारकों और खरीदारों ने मिलकर इस खेल को अंजाम दिया है।
कलेक्टर के आदेशों को पलटकर दी गई बिक्री की अनुमति
विभिन्न मामलों में जिला कलेक्टर शीला दाहिमा ने पट्टे के वैध दस्तावेज या पर्याप्त आवश्यकता न होने के कारण आवेदन खारिज कर दिए थे। इनमें बगवाज, चोंडपुर, सोईकलां और प्रेमपुरा की जमीनें शामिल थीं। हालांकि, बाद में कमिश्नर कार्यालय ने पुराने रिकॉर्ड, लंबे कब्जे या नए शपथ-पत्रों को आधार बनाते हुए इन सभी चारों मामलों में जमीन बेचने की अनुमति प्रदान कर दी।
अनुमति आदेश जारी होने के बाद और मूल फाइल जिले में पहुंचने से पहले ही महज 12 दिनों के भीतर जमीनों की रजिस्ट्री भी करा ली गई। उदाहरण के तौर पर, प्रेमपुरा और चोंडपुर की जमीन बेचने के लिए मुर्तजा नाम के व्यक्ति ने आवेदन किए थे। तहसीलदार और एसडीएम स्तर से अनुशंसा मिलने के बाद कलेक्टर ने इन्हें खारिज कर दिया था, लेकिन कमिश्नर कार्यालय से आदेश होने के बाद इनकी रजिस्ट्री संपन्न हो गई।
अधिकारियों की प्रतिक्रियाएं
यह मामला वरिष्ठ न्यायालय का है। उन्होंने अपने क्षेत्राधिकार का उपयोग कर आदेश दिए हैं, इसलिए मैं इस पर टिप्पणी नहीं कर सकती। - शीला दाहिमा, कलेक्टर, श्योपुर
मैं अभी बाहर हूं। सात सितंबर तक अवकाश पर हूं। - सुरेश कुमार, कमिश्नर, चंबल संभाग






टिप्पणियाँ 2
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। ग्वालियर चंबल टाइम्स पर भरोसा बना रहता है।
अंचल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!