मुरैना जिले के कैलारस स्थित ऐतिहासिक 'दि मुरैना मंडल सहकारी शक्कर कारखाना' को पुनः संचालित करने की मांग को लेकर चल रहा विरोध प्रदर्शन और तेज हो गया है। कारखाने को दोबारा शुरू कराने के लिए जनप्रतिनिधियों और स्थानीय किसानों का आमरण-अनशन रविवार को लगातार दूसरे दिन भी जारी रहा।

किसानों ने खून-पसीने और गहने बेचकर खड़ी की थी मिल

इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे विधायक पंकज उपाध्याय ने जानकारी दी कि इस शक्कर कारखाने की आधारशिला वर्ष 1965 में रखी गई थी। उस दौर में श्योपुर से लेकर भिंड तक के किसानों ने भीषण आर्थिक तंगी के बावजूद अपनी जमीन, मवेशी और यहां तक कि जेवर गिरवी रखकर या बेचकर इसके शेयर खरीदे थे। जब उस समय सोने की कीमत मात्र 180 रुपए प्रति तोला हुआ करती थी, तब अन्नदाताओं और सहकारी समितियों ने अपनी पाई-पाई जोड़कर इस उद्योग को खड़ा किया था।

कारखाने में वर्ष 1971-72 के दौरान गन्ने की पिराई का कार्य विधिवत शुरू हुआ, जिससे करीब 15 हजार से अधिक किसान परिवारों और लगभग 2 हजार मजदूरों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला करता था।

2011 में महज एक ट्रॉली लकड़ी का बहाना बनाकर बंद कर दी गई थी मिल

स्थानीय किसानों और संघर्ष समिति के सदस्यों का आरोप है कि वर्ष 2003 के बाद से ही इस इस कारखाने पर भू-माफियाओं और निहित स्वार्थ वाले लोगों की बुरी नजर पड़ गई थी। वर्ष 2008 में इसे कुछ समय के लिए रोका गया और अंततः 2011 में केवल एक ट्रॉली लकड़ी न मिलने का तुच्छ बहाना बनाकर इसकी स्टीम डाउन कर दी गई। उस वक्त मशीनों के भीतर मौजूद लाखों रुपए मूल्य का गन्ने का रस नाले में बहा दिया गया, और तब से यह उपजाऊ अंचल की यह जीवनरेखा पूरी तरह से ठप पड़ी है।

करोड़ों की जमीन को औने-पौने दामों में बेचने की साजिश का आरोप

आंदोलनकारियों का गंभीर आरोप है कि विभिन्न सरकारों के दौर में नेताओं और मुख्यमंत्रियों ने इस मिल को फिर से चालू करने के केवल खोखले आश्वासन दिए, लेकिन धरातल पर इसे पुनर्जीवित करने के बजाय अब इसे कौड़ियों के भाव बेचने की पटकथा लिखी जा रही है।

वर्तमान में इस कारखाने की जिस बेशकीमती जमीन का बाजार मूल्य करीब 450 करोड़ रुपए आंका गया है, उसे महज 61 करोड़ रुपए में एमएसएमई (MSME) विभाग को सौंपने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि इस प्रक्रिया में न तो किसानों के बकाए का भुगतान किया गया है और न ही पुराने श्रमिकों को उनका पूरा हक मिला है।

क्षेत्र में आज भी प्रचुर मात्रा में गन्ने की पैदावार होती है, जिससे आसानी से 5 शक्कर मिलें चलाई जा सकती हैं। किसान और स्थानीय नागरिक इस मिल को किसी भी कीमत पर बिकने नहीं देंगे और सरकार को इसे सहकारिता के माध्यम से फिर से शुरू करने के लिए विवश कर देंगे।