ग्वालियर-चंबल अंचल के अंबाह कस्बे में महर्षि वाल्मीकि जयंती धूमधाम के साथ मनाई गई। इस विशेष अवसर पर शहर के भीतर एक भव्य चल समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया।

पुरानी बस्ती से हुई चल समारोह की शुरुआत

इस धार्मिक आयोजन का आरंभ नगर की पुरानी बस्ती से किया गया। तय किए गए रूट के मुताबिक जुलूस शहर के कई मुख्य रास्तों और चौराहों से होता हुआ गुजरा, जहां स्थानीय नागरिकों ने इसका स्वागत किया।

यात्रा का कारवां पुरानी बस्ती से आगे बढ़कर जयश्वर महादेव रोड, मंशापूर्ण क्षेत्र और परेड चौराहा पहुंचा। इसके पश्चात दाऊ की कोठी, टेक चंद स्कूल, उसेथ घाट रोड और पोरसा चौराहे से होते हुए यह जुलूस आगे बढ़ा।

शहर का भ्रमण कर शाम को हुआ समापन

पोरसा चौराहे के बाद चल समारोह पीपल चौराहा तथा नगर पालिका चौराहा से गुजरते हुए पुनः अपनी शुरुआती जगह यानी पुरानी बस्ती में जाकर संपन्न हुआ। यह पूरा मार्ग लगभग शाम 5:30 बजे तय किया गया।

यात्रा के समापन स्थल पर महर्षि वाल्मीकि के स्वरूप की विधिवत आरती उतारी गई। इस दौरान रथ पर सजे महर्षि वाल्मीकि के साथ-साथ लव और कुश के स्वरूप आकर्षण का मुख्य केंद्र रहे।

महर्षि वाल्मीकि और रामायण का पौराणिक महत्व

धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि वाल्मीकि ने ही भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र, आदर्शों और इतिहास पर आधारित रामायण ग्रंथ की रचना की थी।

ऐसी मान्यता है कि माता सीता को जब वनवास मिला था, तब महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें अपने आश्रम में शरण दी थी। उन्होंने ही भगवान श्रीराम के दोनों पुत्रों, लव और कुश को अपने आश्रम में रखकर शिक्षा-दीक्षा प्रदान की थी।