मुरैना जिले के अंबाह कस्बे में जैन संत आर्यिका सम्पर्कमति माताजी ने बुधवार शाम करीब छह बजे अपनी देह त्याग दी। उनके महाप्रयाण के समय आसपास मौजूद श्रद्धालु लगातार णमोकार महामंत्र का जाप कर रहे थे, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।

तीन दिन से चल रही थी कठोर साधना

स्थानीय जैन समाज के प्रतिनिधियों ने जानकारी दी कि माताजी पिछले तीन दिनों से पूरी तरह से अन्न और जल का त्याग कर आत्म साधना में जुटी हुई थीं। जीवन के अंतिम क्षणों तक उनकी साधना और ध्यान पूरी निष्ठा के साथ जारी रहे।

2016 में ग्रहण की थी जैन दीक्षा

मूलरूप से गुजरात के हिम्मतनगर की रहने वाली आर्यिका सम्पर्कमति माताजी ने वर्ष 2016 में राजस्थान के बारां शहर में जैन दीक्षा स्वीकार की थी। वे गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री संगममति माताजी की प्रमुख शिष्याओं में शामिल थीं।

वर्तमान2 वर्ष उनका चातुर्मास अंबाह में ही संपन्न हो रहा था। उनकी समाधि लेने की दुखद सूचना मिलते ही अंबाह क्षेत्र के जैन समाज और श्रद्धालुओं में शोक की लहर दौड़ गई और बड़ी संख्या में लोग उनके दर्शन के लिए पहुंचने लगे।

जैन परंपरा में आत्मसाधना की प्रक्रिया

गुरु संगममति माताजी ने जैन परंपरा के इस मार्ग पर प्रकाश डालते हुए बताया कि समाधिमरण या संथारा जीवन के अंतिम पड़ाव पर राग और द्वेष भाव को समाप्त करते हुए अपनी आत्मा को शुद्ध करने की एक सर्वोच्च प्रक्रिया है। इसमें क्षमा, विनय और वैराग्य के साथ णमोकार महामंत्र का स्मरण किया जाता है।

अंतिम यात्रा और संस्कार

जैन समाज के जिनेश जैन ने बताया कि गुरुवार सुबह 10 बजे श्रद्धालुओं द्वारा नगर में डोला निकाला जाएगा। इसके बाद अंबाह स्थित जैन बगीची में उनकी अंतिम क्रियाएं पूरी विधि-विधान के साथ संपन्न की जाएंगी।