कभी दुर्दांत डकैतों और बीहड़ों के लिए कुख्यात रही चंबल घाटी की भौगोलिक बनावट तेजी से बदल रही है। आधुनिक मशीनों और समतलीकरण के कार्यों के चलते बीहड़ जमीन का दायरा लगातार सिमटता जा रहा है, जिससे इस अंचल का भू-भाग नए रूप में सामने आ रहा है।

इसरो और विज्ञान परिषद की मैपिंग में हुआ खुलासा

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद की सैटेलाइट मैपिंग रिपोर्ट के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह बात सामने आई है कि छह साल की अवधि में चंबल संभाग के लगभग 59 हजार हेक्टेयर बीहड़ क्षेत्र में गिरावट आई है।

पहले मुरैना, भिंड और श्योपुर जिलों में कुल मिलाकर 1.73 लाख हेक्टेयर में बीहड़ फैले हुए थे, जो अब घटकर 1.14 लाख हेक्टेयर ही रह गए हैं। इस प्रकार इन जिलों में लगभग 34 प्रतिशत बीहड़ क्षेत्र कम हुआ है।

सरकारी योजनाएं और अवैध कब्जे मुख्य वजह

राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2018-19 से 2024-25 के बीच कुल 59 हजार हेक्टेयर बीहड़ कम हुआ। इसमें से करीब 24 हजार हेक्टेयर भूमि को विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से खेती योग्य बनाने के लिए समतल किया गया।

शेष लगभग 35 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में भू-माफिया द्वारा अनधिकृत कब्जे किए जाने का अनुमान जताया गया है। हालांकि, इन कब्जों की पूरी आधिकारिक पुष्टि संबंधित राजस्व रिकॉर्ड के मिलान और मैदानी सीमांकन के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

जलीय जीवों और पारिस्थितिकी पर मंडराया संकट

राज्य वन अनुसंधान संस्थान जबलपुर की रिपोर्ट के अनुसार इस बदलाव से चंबल नदी के जलीय जीवों पर भी असर पड़ रहा है। नदी के तल के उथले होने और बहाव में बदलाव आने से जलीय जीवों की प्राकृतिक गतिविधियों में बाधा उत्पन्न हो रही है।

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य के अधीक्षक श्याम सिंह चौहान का कहना है कि अभयारण्य क्षेत्र में कई स्थानों पर राजस्व भूमि भी शामिल है। सटीक सीमांकन और स्पष्ट सीमा तय होने के बाद ही नदी किनारे चल रहे समतलीकरण और अनधिकृत कब्जों पर पूरी तरह से रोक लगाई जा सकेगी।