ग्वालियर में मानसून के मौसम के आगमन के साथ ही सड़कों पर आवारा कुत्तों का आक्रामक रवैया तेजी से बढ़ गया है। स्थिति यह है कि गली-मोहल्लों से लेकर मुख्य मार्गों तक नागरिकों का पैदल चलना मुश्किल हो गया है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, इस साल की शुरुआत यानी एक जनवरी से 31 अगस्त के बीच शहर में आठ हजार से अधिक लोग कुत्तों के हमले का शिकार होकर घायल हो चुके हैं।

अस्पतालों में उमड़ रही मरीजों की भारी भीड़

डॉग बाइट के बढ़ते इन मामलों का सीधा असर शहर के प्रमुख स्वास्थ्य केंद्रों पर देखने को मिल रहा है। जयारोग्य अस्पताल के एक हजार बिस्तर वाले अस्पताल परिसर में गंभीर रूप से घायल मरीज पहुंच रहे हैं। इसके अलावा मुरार जिला अस्पताल और हजीरा सिविल अस्पताल में प्रतिदिन 70 से 80 लोग एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगवाने पहुंच रहे हैं। बिरला नगर और थाटीपुर के चिकित्सालयों में तो बारिश का दौर शुरू होने के बाद से ऐसे मामलों में तीस प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है।

रेबीज संक्रमण से सात मरीजों की मौत

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस वर्ष जनवरी से जुलाई के बीच रेबीज की चपेट में आने से कुल सात लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें से तीन मृतक ग्वालियर शहर के ही रहने वाले थे, जबकि चार अन्य मरीज आसपास के दूसरे जिलों से संबंधित थे। इन मौतों ने स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन दोनों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

नगर निगम के अभियानों पर उठ रहे सवाल

बढ़ते हादसों के बाद नगर निगम के एनिमल बर्थ कंट्रोल यानी एबीसी प्रोग्राम और श्वान पकड़ने के अभियानों पर बड़े सवालिया निशान लग गए हैं। लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद जमीन पर नसबंदी अभियान प्रभावी रूप से संचालित नहीं हो रहा है। जलभराव वाले क्षेत्रों, कचरे के ढेरों और संकरी गलियों में कुत्तों के झुंड खुलेआम घूम रहे हैं, लेकिन निगम का डॉग कैचर अमला सक्रिय नजर नहीं आ रहा है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हल्के घाव या खरोंच पर एंटी-रेबीज वैक्सीन दी जाती है, जबकि गहरे जख्म या चेहरे और गर्दन पर काटने के मामलों को श्रेणी तीन में रखा जाता है। ऐसे गंभीर मामलों में डॉक्टर की सलाह पर इम्यूनोग्लोबुलिन का इस्तेमाल किया जाता है। विशेषज्ञों की सलाह है कि कुत्ते के काटने पर तुरंत घाव को कम से कम पंद्रह मिनट तक साफ पानी और साबुन से धोना चाहिए।