शहर में अवैध और नियम विरुद्ध तरीके से लगाए गए यूनीपोल व होर्डिंग्स को लेकर नगर निगम द्वारा की जा रही कार्रवाई से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच हैरान रह गई है। अदालत के सामने यह बात आई कि निगम ने पहले यूनीपोल के बोल्ट खोले लेकिन प्लेटफॉर्म वहीं छोड़ दिए। इसके करीब एक महीने बाद जब प्लेटफॉर्म हटाने की कार्रवाई शुरू की गई, तो केवल जमीन के ऊपर दिखने वाले हिस्से को ही तोड़ा गया, जबकि नीचे का फाउंटेन या मजबूत ढांचा जस का तस छोड़ दिया गया।

वेंडर के आर्थिक हितों को बचाने का आरोप

यह पूरा मामला जब अदालत के संज्ञान में आया, तो जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की डिवीजन बेंच ने बेहद तल्ख टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि यह वास्तव में चौंकाने वाला है कि नगर निगम अब भी अदालत के साथ खेल रहा है और वेंडर के आर्थिक हितों को बचाने की कोशिश कर रहा है। यह स्थिति तब है जब निगम खुद मान रहा है कि कई यूनीपोल बिना अनुमति के लगाए गए थे। सुनवाई के दौरान निगम के वकील ने पूरे डिवाइडर को पहले जैसी स्थिति में लाने के लिए अदालत से कुछ और समय की मांग की है।

अनुमति देने वाले अधिकारियों पर भी होगी कार्रवाई

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि अनुमति लेकर भी यूनीपोल लगाए गए हैं और वे नियमों के विपरीत स्थानों पर खड़े हैं, तो ऐसी अनुमति देने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। नगर निगम ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में अधिकारी सतेंद्र सिंह भदौरिया, केशव सिंह चौहान और सुनील सिंह चौहान को चार्जशीट जारी की जा चुकी है। इसके अलावा सेवानिवृत्त अधिकारी अनिल दुबे और हसीन अख्तर के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की गई है, जबकि कर्मचारी संदीप शर्मा को भी नोटिस थमाया गया है।

निगम के हालिया सर्वे में रेलवे की भूमि पर 19 यूनीपोल पाए गए हैं। रेलवे की ओर से इनकी वैधानिक स्थिति स्पष्ट न होने पर हाईकोर्ट ने उत्तर मध्य रेलवे झांसी मंडल के डीआरएम को इस मामले में पक्षकार बनाया है। अब डीआरएम को आगामी सुनवाई में यहबताना होगा कि रेलवे की जमीन पर कुल कितने यूनीपोल खड़े हैं और कितनों को वैध अनुमति मिली है। इस मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को तय की गई है।

जांच में सामने आए आंकड़े और बकाया राशि

नगर निगम द्वारा अदालत में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, कुल 253 स्वीकृत लोकेशन में से 132 वैध पाई गईं, जबकि 25 यूनीपोल पूरी तरह अनधिकृत मिले। इसके अलावा 22 यूनीपोल अनुमति के बावजूद फुटपाथ या डिवाइडर पर लगे मिले और 9 यूनीपोल अपनी स्वीकृत जगह से अलग स्थानों पर पाए गए। निगम ने यह भी स्पष्ट किया कि ये आंकड़े अभी अंतिम नहीं हैं और इनकी जांच जारी है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की तरफ से विज्ञापन शाखा की बैठक के मिनट्स रखे गए, जिनसे पता चला कि विज्ञापनों से जुड़े वेंडरों पर करीब 18 करोड़ रुपए का बकाया है। कोर्ट ने एक हफ्ते में इस वसूली की स्थिति स्पष्ट करने को कहा। अपनी गलती स्वीकार करते हुए निगम ने माना कि वेंडरों को पूर्व में दिए गए नोटिस कायदे से जारी नहीं हुए थे। अब निगम ने स्थापना से हटाने तक 10 रुपए प्रति वर्गफीट प्रतिदिन की दर से पेनल्टी लगाते हुए नए संशोधित नोटिस जारी करने की बात कही है।