वेतन सीमा के इतर अन्य मानकों की भी होगी जांच

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर बेंच ने ओबीसी आरक्षण के तहत आने वाली क्रीमीलेयर व्यवस्था को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि किसी भी सरकारी सेवक की केवल सालाना सैलरी को देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि उसका बच्चा क्रीमीलेयर श्रेणी में आता है या नहीं।

इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह सवाल उठा था कि क्या محض आय सीमा पार होने मात्र से अभ्यर्थी को इस दायरे से बाहर किया जा सकता है। इस पर खंडपीठ ने व्यवस्था दी है कि माता-पिता की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है।

सिविल जज की बेटी के मामले में आया फैसला

यह कानूनी विवाद सिविल जज की पुत्री रागिनी राठौर के आवेदन से जुड़ा हुआ है। उनके मामले में पिता का वार्षिक वेतन 16 लाख 99 हजार रुपये होने का हवाला देते हुए आवेदन पर पेंच फंसा था, जिसके बाद मामला अदालत तक पहुंचा।

अदालत ने गौर किया कि रागिनी के पिता ने अपनी सेवा की शुरुआत क्लास-II सिविल जज के रूप में की थी और चालीस वर्ष की आयु पूरी होने के पश्चात उन्हें क्लास-I के पद पर पदोन्नति प्राप्त हुई थी।

सेवा श्रेणी और प्रमोशन को मानना होगा आधार

हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि क्रीमीलेयर के निर्धारण के लिए यह देखना बेहद अहम है कि माता-पिता किस सरकारी पद पर नियुक्त हुए थे और उन्हें किस समय प्रमोशन मिला। केवल सैलरी के आंकड़ों को आधार बनाकर प्रशासनिक निर्णय नहीं लिए जा सकते।

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि वेतन और कृषि भूमि से होने वाली आय को अन्य स्रोतों से प्राप्त आय के साथ मशीनी अंदाज में जोड़कर संपत्ति परीक्षण नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि नियमों का सही पालन होना चाहिए।