ग्वालियर के मानस भवन परिसर में चल रहे दुर्गा पूजा महोत्सव का समापन बुधवार को पारंपरिक और उल्लासपूर्ण माहौल के बीच हुआ। इस दौरान बंगाली समाज के तमाम लोग उपस्थित रहे और पूरे विधि-विधान से मां दुर्गा की आराधना की गई।

षष्ठी से दशमी तक चला विशेष अनुष्ठान

बंगाली सोशल एंड कल्चरल एसोसिएशन के अध्यक्ष तपन कुमार दास के अनुसार, समाज में यह पर्व षष्ठी से दशमी तक मनाया जाता है। इस बार सप्तमी तिथि दो दिन होने के कारण उत्सव कुल छह दिनों तक आयोजित किया गया। रोजाना सुबह 6 बजे से ही पूजा-अर्चना शुरू हो जाती थी जो दोपहर तक चलती थी। इस दौरान मां को नियमित रूप से भोग लगाने के साथ ही आरती उतारी गई, जबकि अष्टमी और नवमी के अवसर पर विशेष अनुष्ठान संपन्न हुए।

नवमी के दिन प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हुए पेठे की बलि दी गई। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि इस विधान से सभी प्रकार की बाधाएं और विपत्तियां टल जाती हैं। इसके साथ ही एक छोटी कन्या को मां दुर्गा का जीवंत स्वरूप मानकर उसकी पूजा की गई और उसे विशेष भोग अर्पित किया गया।

मां के मायके आने का होता है भाव

समाज की सदस्य तपस्वी मजूमदार ने साझा किया कि यह पूरा आयोजन महज एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि देवी के मायके आने का उल्लास है। परंपरा के मुताबिक माता कैलाश पर्वत से अपने मायके आती हैं और कुछ दिन बिताने के बाद विजया दशमी के दिन वापस प्रस्थान करती हैं। इसी भावना के साथ बंगाली समाज इस महापर्व को हर्षोल्लास के साथ मनाता है।

सिंदूर खेला से हुई मां की विदाई

दशमी के पावन अवसर पर विदाई से पहले मां को सिंदूर अर्पित किया गया तथा उन्हें मिठाई और पान का भोग लगाया गया। इसके बाद महिलाओं ने आपस में सिंदूर लगाकर एक-दूसरे के सुखी जीवन और अखंड सौभाग्य की प्रार्थना की।

समाज की शोभा देवी विश्वास ने बताया कि सिंदूर खेला देवी को विदा करने का मुख्य अनुष्ठान है। इसे माता के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। इस रीति के साथ ही इस वर्ष के दुर्गा महोत्सव का समापन हो गया और सभी ने अगले साल मां के दोबारा आने की प्रार्थना की।