राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय का सातवां दीक्षांत समारोह गरिमापूर्ण माहौल में संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में राज्यपाल मंगुभाई पटेल मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए और छात्र-छात्राओं को उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया।

संस्कृति और कला के बिना अधूरा है विकास

समारोह को संबोधित करते हुए राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने कहा कि भारतीय कला, संगीत और संस्कृति किसी भी राष्ट्र की मुख्य पहचान होती है। इनके बिना देश का समग्र विकास अधूरा माना जाता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी कला, शोध और नए नवाचारों के जरिए भारतीय विरासत को वैश्विक मंच पर नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएं।

राज्यपाल ने इस बात पर भी जोर दिया कि विलुप्त हो रहे पारंपरिक लोक संगीत और कलाओं को सहेजने की जरूरत है। उन्होंने शिक्षकों से यह भी आग्रह किया कि वे गरीब, वंचित और प्रतिभावान बच्चों की विशेष मदद करें ताकि उन्हें कला व संगीत के क्षेत्र में आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर मिल सकें।

बजट की कमी नहीं आने दी जाएगी: धर्मेंद्र सिंह लोधी

कार्यक्रम में संस्कृति एवं पर्यटन राज्यमंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी भी उपस्थित रहे। उन्होंने विद्यार्थियों को बधाई देते हुए कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि यहां के छात्र संगीत और कला जगत में ग्वालियर का नाम रोशन करेंगे। मंत्री ने आश्वासन दिया कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार संस्थान के विकास के लिए प्रतिबद्ध है और इसके लिए बजट की कोई कमी आड़े नहीं आने दी जाएगी।

समारोह के दौरान शैक्षणिक सत्र 2024-25 और 2025-26 के कुल 67 विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक से नवाजा गया, जबकि 368 छात्र-छात्राओं को विभिन्न उपाधियां प्रदान की गईं। इसके अतिरिक्त, 14 शोधार्थियों को पीएचडी की उपाधि से भी सम्मानित किया गया।

मेधावियों ने सफलता का श्रेय गुरुओं को दिया

पदक हासिल करने वाले विद्यार्थियों ने अपनी इस कामयाबी का पूरा श्रेय अपने माता-पिता और गुरुजनों के मार्गदर्शन को दिया। उज्जैन के कॉलेज से कला के विभिन्न पाठ्यक्रमों में दो स्वर्ण पदक पाने वाले पुनीत कदवाने ने कहा कि वे भविष्य में फ्रीलांस आर्टिस्ट के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं।

कार्यक्रम के अंत में प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित अजय पोहनकर ने अपनी सुमधुर ठुमरी और भजनों की प्रस्तुति से उपस्थित सभी लोगों का मन मोह लिया। कुलगुरु प्रो. स्मिता सहस्त्रबुद्धे ने इस आयोजन को विश्वविद्यालय के इतिहास का एक गौरवशाली क्षण बताया।