गुना जिले में अक्टूबर 2021 के दौरान चर्चा में आए डीएपी खाद की कालाबाजारी के एक मामले में सत्र न्यायालय ने आरोपी कारोबारी को दोषमुक्त कर दिया है। इससे पहले निचली अदालत ने आरोपी को दोषी करार देते हुए 6 महीने के कारावास और 1 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ सत्र न्यायालय में अपील की गई थी।
क्या था पूरा मामला और कैसे हुई थी कार्रवाई
यह पूरा घटनाक्रम अक्टूबर 2021 का है जब जिले में डीएपी खाद का गंभीर संकट चल रहा था। मारकी महू क्षेत्र में स्थित एक किराना दुकान से संबंधित एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि 1200 रुपए निर्धारित सरकारी कीमत वाली डीएपी की बोरी को 1400 रुपए में बेचा जा रहा है। इसी वीडियो के आधार पर कृषि और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम ने दुकान पर छापा मारा था।
छापेमारी के दौरान दुकान के एक कमरे से डीएपी की 42 बोरियां, यूरिया के 12 बैग, कीटनाशक और सरसों के बीज बरामद किए गए थे। इस कार्रवाई के बाद सिरसी थाने में दुकानदार के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955, उर्वरक नियंत्रण आदेश 1985 और बीज नियंत्रण आदेश 1968 की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। वहीं, आरोपी दुकानदार ने अपने बचाव में दलील दी थी कि यह सारा खाद, बीज और कीटनाशक उसने केवल अपने निजी इस्तेमाल के लिए खरीदा था।
सबूतों के अभाव और गवाहों के पलटने से मिला लाभ
सत्र न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह असमर्थ रहा कि आरोपी द्वारा अधिक कीमत पर खाद बेची गई थी या उसने किसी वैधानिक आदेश का उल्लंघन किया था। कृषि विभाग के अधिकारी यह तक नहीं बता सके कि जब्त की गई खाद किस कंपनी की थी और उसका निर्माण किस महीने तथा वर्ष में हुआ था।
जांच के दौरान सबसे बड़ा पेंच उस वायरल वीडियो को लेकर फंसा, जिसके आधार पर पूरी कार्रवाई शुरू की गई थी। वह मूल वीडियो क्लिप न तो पुलिस द्वारा जब्त की गई और न ही विचारण न्यायालय के समक्ष पेश करके विधिवत प्रमाणित की गई। कार्रवाई करने वाले वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी ने अपने बयानों में स्वीकार किया कि वह वीडियो उनके मोबाइल पर आया ही नहीं था और न ही उसे जब्त किया गया था। इसी प्रकार तकनीकी सहायक ने भी कहा कि उसने ऐसा कोई वायरल वीडियो नहीं देखा था। कोर्ट में न तो वह मोबाइल, पेनड्राइव या सीडी पेश की गई और न ही वीडियो बनाने वाले किसी स्वतंत्र गवाह के बयान दर्ज किए गए।
दुकान का मालिकाना हक और पीड़ित पक्ष भी नहीं हुआ साबित
अदालत में यह बात भी सामने आई कि शुरुआती दस्तावेजों में दुकान राकेश कुमार अग्रवाल की बताई गई थी, जबकि आरोपी मनोज कुमार अग्रवाल उस दुकान का प्रोपराइटर, लाइसेंसधारी या अधिकृत डीलर था, इसका कोई भी ठोस दस्तावेजी प्रमाण पेश नहीं किया गया जिससे दुकान का मालिकाना हक पुख्ता हो सके।
इसके अलावा, पुलिस और प्रशासनिक अमले ने जांच के दौरान एक भी ऐसे खरीदार या किसान का बयान दर्ज नहीं किया जिसने वास्तव में 1400 रुपए देकर खाद खरीदी हो। इन सभी तकनीकी कमियों और साक्ष्यों के अभाव को देखते हुए सत्र न्यायालय ने आरोपी मनोज कुमार अग्रवाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया।






टिप्पणियाँ 2
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। ग्वालियर चंबल टाइम्स पर भरोसा बना रहता है।
अंचल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!