पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व के विशेष आयोजन के तहत शहर के पार्श्वनाथ बड़े जैन मंदिर परिसर में एक खास सांस्कृतिक प्रस्तुति दी गई। वीर शासन ग्रुप के तत्वावधान में विनर सोसायटी आर्ट एंड कल्चर की ओर से लोककथा पर आधारित रंगमंचीय नाटक ‘पाड़ाशाह और पारस पत्थर’ का मंचन किया गया। इस धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन को देखने के लिए स्थानीय दर्शकों और जैन समाज के लोगों की भारी भीड़ जुटी।

भक्ति और मानवीय मूल्यों पर आधारित रही प्रस्तुति

यह नाटक केवल किसी चमत्कारी पत्थर की कथा तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें भक्ति, करुणा, संयम, त्याग और लोककल्याण जैसे उच्च मानवीय मूल्यों को सजीव किया गया। मंच पर कलाकारों ने अपनी बेहतरीन कला के जरिए इन संदेशों को प्रभावी ढंग से दर्शकों के सामने रखा।

नाटक के मुख्य पात्र पाड़ाशाह के किरदार के जरिए मेहनत, ईमानदारी और जीवों के प्रति दया भाव को जीवन का आधार बताया गया। अपने आराध्य के प्रति अटूट श्रद्धा से प्रेरित होकर पाड़ाशाह जैन मंदिर निर्माण का संकल्प लेता है, जो शांति और नैतिकता का संदेश देता है।

सत्ता और आम जन के बीच टकराव का सजीव चित्रण

पाड़ाशाह की सेवा भावना और सरल स्वभाव के चलते समाज में उसका सम्मान लगातार बढ़ता जाता है। उसकी बढ़ती लोकप्रियता और लोगों का उसके पास अपनी समस्याएं लेकर पहुंचना सत्ता के लिए चिंता का विषय बन जाता है, यहीं से नाटक में आम जनता और सत्ता के बीच का द्वंद्व उभरकर सामने आता है।

रंगमंच पर राजा के दरबार का दृश्य, दरबारियों की साजिशें, पाड़ाशाह और सत्ता पक्ष के बीच संवाद तथा पारस पत्थर से जुड़ी लोकमान्यता को बहुत ही रोचक ढंग से दिखाया गया। कई भावनात्मक दृश्यों के दौरान दर्शक पूरी तल्लीनता से नाटक से जुड़े रहे और सशक्त संवाद अदायगी पर तालियां भी बजाईं।

मनुष्य के भीतर ही है सच्चा पारस

इस रंगमंच प्रस्तुति का मुख्य संदेश यह था कि सच्चा पारस पत्थर बाहर तलाशने की वस्तु नहीं है, बल्कि यह हर इंसान के भीतर की वह चेतना है जो लोभ को त्याग, क्रोध को क्षमा, हिंसा को अहिंसा और संग्रह की भावना को सेवा में बदल देती है।

इस नाटक के लेखक और निर्देशक मधुर जैन ने मंचन के बाद बताया कि यह कृति किसी साधारण चमत्कार की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे साधारण इंसान की गाथा है जो अपनी अटूट भक्ति और सरलता के बल पर पूरे समाज को एक नई सकारात्मक दिशा प्रदान कर सकता है।