गुना जिले के बमोरी क्षेत्र में सहरिया आदिवासी बहुल गांवों से एक बेहद मार्मिक और झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है। यहां आर्थिक तंगहाली और भयंकर गरीबी इस कदर हावी है कि अपनों को दुनिया से रुखसत करने के बाद भी परिवारों को चैन की नींद और मोक्ष नसीब नहीं हो रहा है। मजदूरी कर जीवनयापन करने वाले इन ग्रामीणों के पास इतने साधन नहीं हैं कि वे अपनों की अस्थियां लेकर अकेले हरिद्वार या प्रयागराज जा सकें।

मजदूरी और रोज की रोजी-रोटी का संकट

दैनिक मजदूरी करने वाले इन परिवारों के सामने सबसे बड़ा संकट रोज कमाने और खाने का होता है। यदि कोई एक दिन भी काम छोड़ दे, तो घर में चूल्हा जलना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में अकेले यात्रा करना उनके लिए असंभव सा होता है। जब तक एक साथ आठ से दस परिवारों में ऐसी घटनाएं नहीं हो जातीं, तब तक सामूहिक वाहन का इंतजाम नहीं हो पाता। जब कई परिवार मिलते हैं, तब जाकर वाहन का किराया आपस में बांटा जाता है।

सालों पुराने मामले और पेड़ों के नीचे दबी अस्थियां

बर्धा, ग्वारखेड़ा, बरोदिया, बांसखेड़ी और चित्तोड़ा गांवों में की गई पड़ताल के दौरान ऐसे कई मामले सामने आए जहां लोगों की अस्थियां वर्षों से विसर्जन की बाट जोह रही हैं। बरोदिया गांव में 25 साल, ग्वारखेड़ा में 18 साल, तथा बर्धा और बांसखेड़ी में 15-15 साल पुराने मामले देखने को मिले हैं। ग्रामीण मजबूरी में अस्थियों के डिब्बों या बोतलों को सुरक्षित रखने के लिए घरों के पीछे, जंगलों में या नदी के पास पेड़ों के नीचे दबाकर रखते हैं।

पीढ़ियां बदल जाती हैं पर नहीं जुटती राशि

चित्तोड़ा निवासी 70 वर्षीय पेमा सहरिया के पिता का देहांत 25 साल पहले हुआ था। गरीबी के कारण वे अब तक अस्थि विसर्जन नहीं कर पाए और खुद वृद्ध हो चुके हैं, जिसके बाद अब उन्होंने यह जिम्मेदारी अपने बेटों को सौंपी है। इसी तरह ग्वारखेड़ा के बृजमोहन की माताजी की अस्थियां एक दशक से नीम के पेड़ के नीचे रखी हुई हैं।

खंडेला की रहने वाली मुन्नी बाई के पति का निधन 20 वर्ष पूर्व और उनके बेटे का निधन 5 वर्ष पहले हुआ था। दोनों की एक साथ यात्रा का खर्च उठाने में असमर्थ होने के कारण उन्हें ब्याज पर कर्ज लेना पड़ा, जिसके बाद वे हाल ही में प्रयागराज अस्थियां भेज पाईं।

खो जाने पर मिट्टी के विसर्जन की मजबूरी

सहरिया समाज में हरिद्वार की यात्रा को सर्वोपरि माना जाता है। बर्धा के हरलाल महाराज बताते हैं कि यदि लंबे समय तक संभालकर रखने के कारण किसी की अस्थियां सुरक्षित न रहें या खो जाएं, तो उस स्थिति में उस स्थान की पवित्र मिट्टी को ही ले जाकर नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।