गुना और भोपाल से जुड़े एक बड़े प्रशासनिक मामले में पूर्व आईपीएस अधिकारी रघुवीर सिंह मीना मुश्किलों में घिर गए हैं। पुलिस मुख्यालय की सतर्कता शाखा ने उनके विरुद्ध धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र जैसी गंभीर धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। उन पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी तरीके से अनुसूचित जनजाति वर्ग का प्रमाणपत्र हासिल कर सरकारी सेवा में अनुचित लाभ उठाया।

शिक्षक से लेकर आईपीएस बनने तक का सफर

मूल रूप से गुना जिले के चाचौड़ा क्षेत्र स्थित अजगरी गांव के रहने वाले रघुवीर सिंह मीना ने शुरुआती दौर में अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के आधार पर सरकारी शिक्षक की नौकरी पाई थी। उन्होंने चित्तोड़ा के शासकीय विद्यालय में अपनी सेवाएं दी थीं। इसके बाद वर्ष 1984 में विदिशा जिले से अनुसूचित जनजाति वर्ग का नया प्रमाणपत्र बनवाया गया, जिसके बूते उन्होंने राज्य सेवा परीक्षा पास कर डीएसपी पद प्राप्त किया।

करियर के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। डीएसपी रहने के बाद वे ब्यावरा में एसडीओपी और राजगढ़ में एएसपी रहे। वर्ष 2001 में उन्हें आईपीएस अवार्ड मिला। अपने सेवाकाल में वे बड़वानी और आगर मालवा में पुलिस अधीक्षक तथा गुना व रीवा में कमांडेंट के पद पर तैनात रहे। उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें वर्ष 2005 में वीरता पदक और 2009 में राष्ट्रपति पुलिस पदक से भी सम्मानित किया गया था।

उच्च स्तरीय जांच समिति ने खारिज किया प्रमाणपत्र

इस पूरे मामले की सुगबुगाहट वर्ष 2016 में तब शुरू हुई जब राघौगढ़ निवासी हरवीर सिंह रघुवंशी ने इसकी शिकायत दर्ज कराई। मामला मध्य प्रदेश शासन की अनुसूचित जनजाति संदेहास्पद जाति प्रमाणपत्र उच्च स्तरीय छानबीन समिति के पास पहुंचा। समिति ने जब पुराने दस्तावेजों की गहराई से पड़ताल की, तो आदिम जाति कल्याण विभाग विदिशा द्वारा 1984 में जारी किए गए उस प्रमाणपत्र में अनियमितताएं पाई गईं।

छानबीन समिति ने उक्त अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र को पूरी तरह से अमान्य घोषित कर दिया। समिति की रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि नियमों को दरकिनार कर यह दस्तावेज हासिल किया गया था और इसी के आधार पर लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास की गई थी। इसी रिपोर्ट को आधार बनाते हुए सतर्कता शाखा ने कानूनी कदम उठाया है।

सेवानिवृत्ति के बाद लड़े थे पंचायत चुनाव

दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 2021 में पुलिस सेवा से रिटायर होने के तुरंत बाद, वर्ष 2022 में उन्होंने जिला पंचायत का चुनाव लड़ा। इस दौरान उन्होंने अनुसूचित जनजाति के बजाय अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षित सीट का विकल्प चुना, जिससे उनके द्वारा विभिन्न समयों पर इस्तेमाल किए गए वर्गों को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। फिलहाल पुलिस अधिकारी इस पूरे रिकॉर्ड की बारीकी से जांच कर रहे हैं।