पटवारी की नियुक्ति के बाद भी नहीं सुलझे मामले
गुना नगरपालिका क्षेत्र में संपत्ति के नामांतरण से जुड़े मामलों का समय पर निपटारा करने के लिए राजस्व विभाग के एक पटवारी को अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इस अनोखे प्रयोग के बाद भी नागरिकों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। राहत मिलने के बजाय नगरपालिका कार्यालय में लंबित पड़े नामांतरण मामलों की संख्या में लगातार इजाफा दर्ज किया गया है, जिससे यह व्यवस्था सवालों के घेरे में आ गई है।
कलेक्टर के निर्देश पर मिला था अतिरिक्त प्रभार
प्राप्त जानकारी के अनुसार, गुना जिले के कलेक्टर के निर्देशों के तहत एसडीएम गुना ने लगभग दो महीने पहले एक विशेष आदेश जारी किया था। इस व्यवस्था के अंतर्गत गुना ग्रामीण तहसील के अंतर्गत आने वाले बरखेड़ा गिर्द हल्के के पटवारी सौरभ बंसल को एक महीने की अवधि के लिए नगरपालिका के नामांतरण प्रकरणों के भौतिक परीक्षण का जिम्मा सौंपा गया था। प्रदेश के नगरीय निकायों में यह अपने तरह का पहला मामला माना जा रहा था जब राजस्व अमले के पटवारी को नगरपालिका के भीतर इस प्रकार का प्रभार दिया गया था।
जब पटवारी को यह जिम्मेदारी दी गई थी, उस वक्त नगरपालिका में नामांतरण के कुल 629 प्रकरण पेंडिंग चल रहे थे। उस समयावधि में नगरपालिका अध्यक्ष के स्तर पर एक भी फाइल लंबित नहीं थी, जबकि अधिकांश फाइलें मुख्य नगरपालिका अधिकारी के हस्ताक्षर के स्तर पर अटकी हुई थीं। इनमें वर्ष 2025 के 260 और वर्ष 2026 के 255 मामले शामिल थे। उस दौर में डिप्टी कलेक्टर के पास भी नगरपालिका सीएमओ का अतिरिक्त प्रभार रहा था।
दो महीने में केवल 40 फाइलों का हो सका परीक्षण
प्रशासनिक स्तर पर उठाए गए इस कदम के बावजूद कामकाज की रफ्तार बेहद धीमी बनी रही। पिछले दो महीनों के भीतर नियुक्त किए गए पटवारी केवल 40 प्रकरणों का ही परीक्षण कर उन्हें आगे बढ़ा पाए हैं। धीमी कार्यप्रणाली के कारण पेंडेंसी घटने की बजाय और अधिक विकराल हो गई और वर्तमान में लंबित मामलों का आंकड़ा 900 का आंकड़ा पार कर चुका है। मौजूदा स्थिति यह है कि इनमें से एक भी प्रकरण अभी तक अंतिम स्वीकृति के लिए नगरपालिका अध्यक्ष के पास तक नहीं पहुंच पाया है।
मध्य प्रदेश नगरपालिका अधिनियम 1961 के प्रावधानों के अनुसार, निकायों में नामांतरण की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए पहले से ही उनका अपना राजस्व अमला मौजूद रहता है, जिसमें राजस्व निरीक्षक और अन्य मैदानी कर्मचारी शामिल होते हैं। नियमों के मुताबिक दस्तावेजों का परीक्षण होने के बाद फाइल सीएमओ के पास जाती है और अंत में नगरपालिका अध्यक्ष के हस्ताक्षर होने के बाद ही नामांतरण प्रक्रिया मुकम्मल होती है। बावजूद इसके पटवारी को विशेष तौर पर बैठाए जाने पर भी मामलों का अंबार लगना स्थानीय नागरिकों और जानकारों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।






टिप्पणियाँ 2
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। ग्वालियर चंबल टाइम्स पर भरोसा बना रहता है।
अंचल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!