दतिया जिले के उदगंवा इलाके के सलैया पमार आदिवासी डेरे में एक साल की मासूम बच्ची की उल्टी-दस्त के चलते जान चली गई। मृतका की पहचान नीलू आदिवासी के रूप में हुई है, जिसे गंभीर हालत में जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

अस्पताल से बिना डिस्चार्ज कराए ले आए थे घर

बच्ची के पिता धर्मेंद्र आदिवासी ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि उनकी बेटी को अचानक उल्टी-दस्त की शिकायत हुई थी, जिसके बाद वे उसे उसी शाम जिला अस्पताल लेकर पहुंचे थे। डॉक्टरों ने स्थिति को गंभीर देखते हुए उसे पीआईसीयू वार्ड में दाखिल किया था। कुछ दिनों तक चले उपचार के बाद उसकी सेहत में सुधार भी दिखाई देने लगा था।

धर्मेंद्र के अनुसार, इलाज के बीच में ही वे अस्पताल गए और बिना डॉक्टर की औपचारिक छुट्टी यानी डिस्चार्ज कराए अपनी बेटी को अपने साथ घर ले आए। घर लौटने पर उसी शाम को नीलू की तबीयत एक बार फिर से अचानक बिगड़ गई, लेकिन परिजन उसे दोबारा अस्पताल नहीं पहुंचा सके और कुछ देर बाद उसने दम तोड़ दिया।

गांव में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली पर उठे सवाल

यह घटना ऐसे वक्त में सामने आई है जब पूरे जिले में स्वास्थ्य विभाग द्वारा दस्तक अभियान संचालित किया जा रहा है। स्थानीय लोगों और परिजनों का आरोप है कि इस दुर्घटना के बाद भी स्वास्थ्य विभाग का कोई भी मैदानी अमला या टीम सुदूर गांव तक नहीं पहुंची।

ग्रामीणों ने क्षेत्र की चिकित्सा व्यवस्था पर गहरा असंतोष जाहिर करते हुए बताया कि उनके गांव स्थित उपस्वास्थ्य केंद्र पर अमूमन ताला लटका रहता है। यहाँ तैनात रहने वाली सीएचओ अक्सर ग्वालियर से अप डाउन करती हैं और कई बार समय से पहले ही वापस लौट जाती हैं, जिससे ग्रामीणों को त्वरित चिकित्सा लाभ नहीं मिल पाता है।

इलाज के लिए दतिया दौड़ने को मजबूर हैं ग्रामीण

स्थानीय निवासियों का कहना है कि उपस्वास्थ्य केंद्र के नियमित तौर पर न खुलने के कारण उन्हें हर छोटी-मोटी बीमारी या आपात स्थिति में इलाज के वास्ते दतिया जिला मुख्यालय की ओर रुख करना पड़ता है। इस मासूम बच्ची की असामयिक मृत्यु ने ग्रामीण अंचल की स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलकर रख दी है।