मध्य प्रदेश के दतिया स्थित मां पीतांबरा पीठ की ख्याति देश-विदेश तक फैली है। यह स्थल केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यहां शक्ति उपासना और राष्ट्ररक्षा से जुड़ी कई ऐतिहासिक परंपराएं भी रही हैं। यही कारण है कि आम जनता के अलावा देश के बड़े राजनेता और प्रशासक भी यहां शीश नवाने आते रहे हैं।
स्वामीजी महाराज की तपस्थली और स्थापना
उपलब्ध विवरणों के अनुसार, स्वामीजी महाराज 9 जुलाई 1929 को दतिया पहुंचे थे और वनखंडेश्वर महादेव मंदिर परिसर को अपनी साधना स्थली बनाया। उस समय इस क्षेत्र को वनखंडी कहा जाता था। इसके बाद, 23 मई 1935 को उन्होंने यहां मां बगलामुखी के विग्रह की स्थापना की। शाक्त परंपरा में मां बगलामुखी को आठवीं महाविद्या माना जाता है और इनकी उपासना शत्रुओं पर विजय पाने तथा संकटों से रक्षा के लिए की जाती है।
राजसत्ता की देवी के रूप में मान्यता
मां बगलामुखी की आराधना से जुड़ी मान्यताओं के कारण पीतांबरा पीठ को राजसत्ता से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि यहां पूजा करने से कठिन परिस्थितियों में भी सफलता मिलती है। इसी विश्वास के चलते पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और राजमाता विजयाराजे सिंधिया जैसी दिग्गज हस्तियां यहां दर्शन के लिए पहुंचती थीं। हालांकि, यहां आने वाले भक्तों में राजनेताओं के साथ-साथ आम श्रद्धालु भी शामिल हैं।
पीठ के आचार्य विष्णुकांत मुड़िया के अनुसार, मां पीतांबरा को केवल राजसत्ता देने वाली देवी मानना उनकी महिमा को सीमित करने जैसा है। वे संपूर्ण ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री हैं और भक्तों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ प्रदान करती हैं।
1962 के युद्ध और 51 कुंडीय महायज्ञ का प्रसंग
इस सिद्धपीठ के इतिहास में 1962 के भारत-चीन युद्ध का प्रसंग बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। पीठ की परंपरा के अनुसार, युद्ध के समय देश की रक्षा की कामना से 19 दिसंबर 1962 को विशेष राष्ट्ररक्षा अनुष्ठान किया गया था। इस दौरान 51 कुंडीय महायज्ञ संपन्न हुआ था। धार्मिक मान्यताओं में ऐसा माना जाता है कि इस महायज्ञ के बाद चीनी सेना ने पीछे हटना शुरू कर दिया था।
मां धूमावती की स्थापना
इस पीठ में मां बगलामुखी के साथ-साथ मां धूमावती की भी विशेष आराधना होती है। स्वामीजी महाराज ने 13 जून 1978 को मां धूमावती के विग्रह की स्थापना की थी। दस महाविद्याओं में सातवीं मानी जाने वाली मां धूमावती की उपासना वैराग्य और विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है, और शनिवार को यहां उनके दर्शन का खास महत्व होता है।






टिप्पणियाँ 2
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। ग्वालियर चंबल टाइम्स पर भरोसा बना रहता है।
अंचल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!