ग्वालियर-चंबल अंचल के दतिया जिले में आस्था और परंपरा का एक अनूठा केंद्र इन दिनों चर्चा में है। आमतौर पर नवरात्रि समाप्त होने के बाद दशमी पर मां दुर्गा और मां काली की प्रतिमाओं का विसर्जन कर दिया जाता है, लेकिन दतिया में एक ऐसा पंडाल है जहां लगभग 85 साल पुरानी मिट्टी की प्रतिमा का विसर्जन नहीं होता है। शहर के दारूगर की पुलिया के पास स्थित इस पावन दरबार में कई दशकों से विशेष विधि-विधान और तांत्रिक पद्धति से मां काली की आराधना की जा रही है।

तीन पीढ़ियों से सहेज कर रखी जा रही है यह प्राचीन परंपरा

दारूगर की पुलिया पर लंबे समय से पान की दुकान संचालित करने वाले 79 वर्षीय राजाराम चौरसिया बताते हैं कि उन्होंने जब से होश संभाला है, तब से इस स्थान पर मां काली का भव्य दरबार सजते देख रहे हैं। उनके अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत कुरियाने मोहल्ले के कई परिवारों ने मिलकर की थी। जिस स्थान पर आज माता की प्रतिमा विराजित है, वह मूल रूप से नारायणदास पाठक का चबूतरा हुआ करता था। श्रद्धालुओं की अटूट आस्था को देखते हुए उन्होंने वह जमीन पूजा-पाठ के लिए दान दे दी थी, जिसके बाद आसपास के लोगों ने चंदे से यहां टीनशेड का निर्माण करवाया ताकि दरबार को सुरक्षित रखा जा सके।

सुखदेव बाबा के पहाड़ पर कन्या रूप में दर्शन देने की है मान्यता

स्थानीय बुजुर्गों और जानकार रज्जन चौरसिया के संस्मरणों के मुताबिक, पुराने समय में कुरियाने क्षेत्र में पर्वत कोरी नाम के एक निष्ठावान भक्त रहते थे। वे नियमित रूप से सुखदेव बाबा के पहाड़ पर जाकर साधना करते थे। ऐसी गहरी मान्यता है कि एक दिन कठोर साधना के दौरान मां काली ने उन्हें एक छोटी कन्या के रूप में दर्शन दिए थे। इसी दिव्य अनुभव के बाद पर्वत कोरी ने दारूगर की पुलिया के पास मां काली की प्रतिमा स्थापित करने का दृढ़ संकल्प लिया था, जो आज भी अनवरत जारी है।

इस विशेष प्रतिमा की बनावट भी काफी अलग है। दूध-दही का व्यवसाय करने वाले रज्जन चौरसिया बताते हैं कि यह पूरी प्रतिमा शुद्ध मिट्टी से तैयार की गई है। माता की इस प्रतिमा में एक मुख, चार भुजाएं और दो चरण हैं। इसके साथ ही, माता के गले में सुशोभित 13 नरमुंडों की माला को भी पूरी तरह मिट्टी से ही गढ़ा गया है। नवरात्रि के इन पवित्र दिनों में यहां दूर-दूर से श्रद्धालु माता के दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं।

विसर्जन की बजाय तालाब पर कराई जाती है मुख धोने की रस्म

इस पंडाल की सबसे बड़ी और खास विशेषता इसकी विसर्जन प्रक्रिया से जुड़ी हुई है। नवरात्रि के अंतिम दिन जब जवारे विसर्जन की शोभायात्रा निकलती है, तब मां काली की इस प्राचीन प्रतिमा को भी भव्य बाजे-गाजे के साथ शहर के स्थानीय तालाब तक ले जाया जाता है। हालांकि, अन्य प्रतिमाओं की तरह इसे पानी में डुबोकर विसर्जित नहीं किया जाता है।

तालाब के घाट पर प्रतीकात्मक रूप से केवल माता का मुख जल से धुलवाया जाता है। इसके पश्चात प्रतिमा को साफ वस्त्रों और लाल रंग के नए कपड़े से पूरी श्रद्धा के साथ ढककर वापस सुरक्षित पंडाल में ले आया जाता है। अगले साल फिर से इसी पुरानी प्रतिमा का नए सिरे से श्रृंगार किया जाता है और नौ दिनों तक विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।