दतिया जिला मुख्यालय से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम खैरी की पहाड़ी पर स्थित खैरी माता मंदिर अंचल के भक्तों के लिए बड़ी आस्था का केंद्र है। इस स्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि यहां स्थापित मां काली दिन के अलग-अलग पहर में अपने तीन रूप बदलती हैं। प्रातःकाल माता बाल रूप में नजर आती हैं, दोपहर के समय उनका युवा स्वरूप दिखाई देता है और शाम ढलते-ढलते वे वृद्ध स्वरूप में भक्तों को दर्शन देती हैं।
खैर के वनों से पड़ा माता का नाम खैरी
ऊंची पहाड़ी पर बने इस मंदिर के इतिहास के पीछे भी रोचक तथ्य जुड़े हैं। पूर्वकाल में इस पहाड़ी पर खैर के पेड़ों का बहुत घना जंगल हुआ करता था, जिसके चलते मां काली का नाम खैरी माता पड़ गया। कालांतर में पहाड़ी के आसपास बसे गांव का नाम भी खैरी हो गया। यहां दतिया शहर के अलावा दूरदराज के ग्रामीण इलाकों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। खासतौर पर सुबह और शाम के वक्त मंदिर परिसर में भक्तों का तांता लगा रहता है, जो पैदल या वाहनों के जरिए माता के दर्शन के लिए आते हैं।
महाराजा वीरसिंह जू देव ने की थी स्थापना
इतिहास के पन्नों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण कार्य दतिया के महाराजा वीरसिंह जू देव द्वारा वर्ष 1658 में करवाया गया था। उस वक्त इस पहाड़ी को खैरागढ़ के नाम से जाना जाता था। लोक कथाओं के मुताबिक, माता ने दतिया नरेश को स्वप्न के माध्यम से यह जानकारी दी थी कि उनका विग्रह सेंवढ़ा के सनकुआं में मौजूद है। राजा के वहां पहुंचने पर उन्हें विग्रह मिल गया, जिसे वे हाथी-घोड़ों के लाव-लश्कर के साथ दतिया लाए। महल में स्थापना के प्रयास के बाद माता के निर्देश पर राजा ने इस विग्रह को खैरागढ़ की पहाड़ी पर स्थापित किया।
चैत्र नवरात्र के विशेष आयोजन और मेले की परंपरा
चैत्र नवरात्र के दौरान यहां तीन दिनों तक विशेष अनुष्ठान होते हैं। सप्तमी तिथि को भद्रकाली का दिन मानते हुए पूरे जिले से श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने और जल चढ़ाने आते हैं। नवमी पर माता को जबारे अर्पित किए जाते हैं और बारस के दिन यहां विशाल मेला भरता है। इस दौरान भक्त मंडलियों के रूप में पहुंचते हैं। कुछ श्रद्धालु गाल में लोहे की सरांग छेदकर कीर्तन करते हुए जबारे चढ़ाने आते हैं। वहीं, शारदीय नवरात्र में मंदिर समिति द्वारा लख्खी भंडारे का आयोजन भी किया जाता है।
स्थानीय स्तर पर माता को मनकामेश्वर देवी के रूप में भी पूजा जाता है। उनका यह स्वरूप दुर्गा माई से जुड़ा माना जाता है, जबकि आमजन उनकी आराधना काली माता के रूप में करते हैं। भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होने पर वे मंदिर में भेंट चढ़ाते हैं। जनसहयोग और मंदिर कमेटी के प्रयासों से लगातार यहां विकास कार्य हुए हैं। मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 100 से अधिक सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, और सीढ़ियों पर एक से दो क्विंटल तक वजन वाले कई बड़े घंटे टंगे हुए हैं।






टिप्पणियाँ 2
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। ग्वालियर चंबल टाइम्स पर भरोसा बना रहता है।
अंचल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!