ग्वालियर-चंबल अंचल के ऐतिहासिक नगर दतिया में विजयदशमी के पर्व का स्वरूप समय के साथ काफी बदल चुका है। आज से करीब 80 साल पहले यानी वर्ष 1946 तक यहां दशहरा का पर्व रावण वध से नहीं, बल्कि एक अलग परंपरा के तहत मनाया जाता था।
रियासतकाल में स्टेडियम ग्राउंड पर होती थी प्रथा
इतिहासकारों के मुताबिक, महाराज गोविंद सिंह जूदेव के शासनकाल में दतिया का दशहरा आसपास की रियासतों में काफी प्रसिद्ध था। उस समय शहर के स्टेडियम ग्राउंड में भैंस के पड़े का वध कर पर्व मनाया जाता था, जिसकी गवाही यहां का पुराना इतिहास देता है।
महाराज के शासनकाल में दो बार दशहरा मनाया जाता था। नवरात्रि की नवमी तिथि को किले के अंदर 16 सीढ़ियों पर छोटा दशहरा मनाया जाता था, जहां नगरवासी लोक नृत्य, खेल तमाशे और मल्लयुद्ध का प्रदर्शन करते हुए शस्त्रों की पूजा करते थे।
शाही सवारी और पड़ा वध की परंपरा
मुख्य दशहरा के दिन दतिया नरेश की शाही सवारी किले से निकलकर शहर के मुख्य बाजारों से गुजरते हुए सुरइयन मैदान तक पहुंचती थी। इस भव्य चल समारोह में दतिया नरेश महाराज गोविंद सिंह हाथी पर सवार होकर चलते थे।
इतिहासकार विनोद मिश्र के अनुसार, सुरइयन मैदान पहुंचने पर महाराज एक गुंबद पर बैठते थे और आचार्यों द्वारा विधि-विधान से पड़े की पूजा के बाद उसका वध किया जाता था। हालांकि, वर्ष 1947 में देश स्वतंत्र होने के बाद इस प्रथा को पूरी तरह बंद कर दिया गया।
हाथ ठेले से शुरू हुआ रावण दहन अब 69 फीट तक पहुंचा
आजादी मिलने के बाद परंपरा में बदलाव आया और सादे चल समारोह के तहत मात्र पांच फीट ऊंचे रावण के पुतले को हाथ ठेले पर रखकर स्टेडियम ले जाया जाने लगा। वक्त के साथ पुतले का आकार बढ़ता गया और अब यह ऊंचाई बढ़कर 69 फीट तक पहुंच चुकी है।
स्थानीय स्तर पर मनाए जाने वाले इस पर्व में अब आधुनिकता का भी असर देखा जा सकता है। पहले जहां लोग घर-घर जाकर पर्व की बधाइयां देते थे, वहीं अब शुभकामनाओं का आदान-प्रदान ज्यादातर डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया के जरिए ही हो जाता है।
आज निकलेगा भव्य चल समारोह और होगा पुतला दहन
मंगलवार को निकलने वाले चल समारोह में श्रीराम राजा, माता जानकी, लक्ष्मण, हनुमान जी और भगवान भोलेनाथ समेत रामायण के अन्य पात्रों की सुंदर झांकियां बाजार से भ्रमण करेंगी। शाम छह बजे शुरू होने वाला यह जुलूस बड़ा बाजार, किलाचौक, बिहारी जी मंदिर, गांधी रोड और राजगढ़ चौराहा होते हुए स्टेडियम पहुंचेगा।
स्टेडियम परिसर में भगवान श्रीराम और रावण के बीच प्रतीकात्मक युद्ध होगा, जिसके उपरांत भव्य आतिशबाजी की जाएगी। रात ठीक साढ़े नौ बजे स्टेडियम ग्राउंड में 69 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया जाएगा।






टिप्पणियाँ 2
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। ग्वालियर चंबल टाइम्स पर भरोसा बना रहता है।
अंचल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!