दतिया जिले के सबसे बड़े और बहुचर्चित गैंगवार तथा वर्ष 2003 के सामूहिक हत्याकांड के मुख्य आरोपी महेश यादव का निधन हो गया है। रविवार और सोमवार की दरम्यानी रात ग्वालियर के जयारोग अस्पताल में इलाज के दौरान उसने दम तोड़ दिया। महेश यादव पिछले काफी समय से गंभीर बीमारियों के चलते अस्पताल में भर्ती था और उसका इलाज चल रहा था।

दिनदहाड़े राजगढ़ चौराहे पर हुई थी खूनी वारदात

यह खूनी संघर्ष 23 अप्रैल 2003 को दोपहर करीब डेढ़ बजे हुआ था। अदालत में पेशी के बाद लौट रहे सतेन्द्र सिंह बुंदेला उर्फ भैया राजा और उनके साथियों की जीप को राजगढ़ चौराहे पर रोककर हथियारबंद बदमाशों ने अंधाधुंध फायरिंग कर दी थी। कानूनी पैरवी से जुड़े जानकारों के अनुसार, हमलावरों ने वारदात को अंजाम देते हुए करीब 100 से 150 राउंड गोलियां चलाई थीं। इस भीषण गोलीबारी में सतेन्द्र सिंह बुंदेला, राधावल्लभ दांगी, मोजी तिवारी और धर्मेन्द्र तिवारी की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि सात अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

अदालत ने सुनाई थी 11 बार उम्रकैद की सजा

इस बड़े हत्याकांड में पुलिस ने महेश यादव के अलावा वनमाली कुशवाह, अतर सिंह यादव, मुन्ना यादव, बरजोर सिंह यादव, मुकेश टांडोरिया, भूरे सिंह यादव, दौलत सिंह यादव और राकेश सिंह यादव को आरोपी बनाया था। मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने महेश यादव समेत सात आरोपियों को हत्या और जानलेवा हमले का दोषी ठहराते हुए 11-11 बार आजीवन कारावास की सजा भुगतने का आदेश दिया था। इसके साथ ही साजिश रचने के आरोप में दौलत सिंह और राकेश सिंह को 10-10 साल की कैद और सभी दोषियों पर आर्थिक जुर्माना भी लगाया गया था।

भाई की हत्या का बदला लेने के लिए रची गई थी साजिश

जांच और अदालत की कार्रवाई के दौरान यह बात सामने आई थी कि इस सामूहिक हत्याकांड की मुख्य वजह पुरानी रंजिश थी। घटना से करीब तीन साल पहले महेश यादव के छोटे भाई सुरेश यादव उर्फ रानी की हत्या कर दी गई थी। सुरेश पर नगरपालिका के पूर्व अध्यक्ष बड़े रावत की हत्या का मुख्य आरोपी होने का आरोप था। सुरेश की हत्या का शक सतेन्द्र सिंह बुंदेला उर्फ भैया राजा और उसके साथियों पर था। इसी रंजिश का बदला चुकाने के लिए 2003 में राजगढ़ चौराहे पर इस खूनी वारदात को अंजाम दिया गया था।

दतिया के अपराध इतिहास में राजगढ़ चौराहे की यह घटना सबसे भयावह घटनाओं में शुमार है। इस कांड के बाद पूरे जिले में लंबे समय तक भारी दहशत का माहौल रहा था। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक इस हत्याकांड के बाद महज तीन महीने के भीतर जिले में 31 हत्याएं दर्ज की गई थीं। इसके अलावा रंगदारी, फायरिंग, मारपीट और लूटपाट की घटनाओं में भी अचानक तेजी आई थी, जिसके चलते दतिया काफी समय तक प्रदेशभर में अपराध और गैंगवार का केंद्र बनकर चर्चा में रहा था।