अशोकनगर जिले में कई ऐसे शक्तिधाम मौजूद हैं जो अपनी खास मान्यताओं, प्राचीनता और अनूठे स्वरूप के कारण अंचलभर में अपनी अलग पहचान रखते हैं। इन मंदिरों में देवी के विभिन्न रूपों के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
तूमैन की मां विंध्यवासिनी और कदवाया की मान्यता
जिला मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तूमैन में मां विंध्यवासिनी का प्राचीन मंदिर है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, तूमैन को राजा मोरध्वज की नगरी माना जाता है और मां विंध्यवासिनी उनकी कुलदेवी थीं। इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर बैकुंठ, मृत्यु लोक और पाताल लोक को दर्शाती अनूठी कलाकृतियां उकेरी गई हैं, जो इसे बेहद खास बनाती हैं।
इसी तरह कदवाया में भी मां के दर्शन से जुड़ी खास मान्यताएं हैं जो यहां आने वाले श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती हैं।
चंदेरी का जागेश्वरी मंदिर और महाभारत कालीन प्रसंग
चंदेरी में स्थित मां जागेश्वरी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां माता का केवल मुखाकृति स्वरूप ही विराजमान है। प्रचलित मान्यताओं के मुताबिक इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है।
कहा जाता है कि राजा कूर्मदेव कुष्ठ रोग से पीड़ित थे और इस पावन स्थान पर आने के बाद उन्हें राहत मिली थी। ऐसी कथा है कि मंदिर निर्माण के दौरान दरवाजा जल्द खोल दिए जाने के कारण माता का केवल मुख ही प्रकट हो पाया था, जिसके दर्शन के लिए आज भी भक्त बड़ी संख्या में आते हैं।
करीला धाम और प्राचीन देवकानी मंदिर
प्रसिद्ध करीला का मां जानकी मंदिर पूरे प्रदेश में अपनी अनूठी पहचान रखता है। यहां माता सीता अपने पुत्र लव और कुश के साथ विराजमान हैं। मन्नतें पूरी होने पर श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और रंगपंचमी के अवसर पर यहां विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें लाखों लोग शामिल होकर परंपरागत राई नृत्य का आनंद लेते हैं।
दूसरी ओर, देवकानी माता मंदिर को जिले के सबसे प्राचीन धार्मिक स्थलों में गिना जाता है, जो करीब 700 साल पुराना माना जाता है। कभी घने जंगल के बीच स्थित रहे इस मंदिर के पास बनी ऐतिहासिक सास-बहू की बावड़ी भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र है जिसमें हमेशा पानी भरा रहता है।
पहाड़ी पर विराजीं मां पहाड़ा वाली
तूमैन क्षेत्र में ही मां पहाड़ा वाली का मंदिर भी श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, लगभग 17 वर्ष पूर्व पहाड़ी के भीतर माता की प्रतिमा प्रकट हुई थी, जिसके बाद वहां भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। वर्तमान में भक्त 76 सीढ़ियां चढ़कर और मुरम के रास्ते से होते हुए माता के दरबार में माथा टेकने पहुंचते हैं।






टिप्पणियाँ 2
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। ग्वालियर चंबल टाइम्स पर भरोसा बना रहता है।
अंचल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!