अशोकनगर जिले में खेतों में पराली और नरवाई जलाने की प्रथा पर रोक लगाने के लिए प्रशासन ने कड़े कदम उठाए हैं। कलेक्टर साकेत मालवीय के निर्देश के बाद कृषि क्षेत्र में इसके प्रबंधन को लेकर तैयारियां तेज कर दी गई हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत यह प्रतिबंध लागू किया गया है, जिसका उद्देश्य पर्यावरण को सुरक्षित रखना और मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बचाना है।

पिछले साल सामने आए थे 510 मामले

बीते खरीफ सीजन के दौरान जिले में पराली जलाने की कुल 510 घटनाएं रिकॉर्ड की गई थीं। इन आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए इस बार प्रशासन ने जमीनी स्तर पर निगरानी बढ़ाने का निर्णय लिया है। इसके लिए ग्राम पंचायत स्तर पर विशेष निगरानी दलों का गठन किया गया है, जिसमें सरपंच, पंचायत सचिव, कृषि विस्तार अधिकारी और पटवारी जैसे मैदानी कर्मचारियों को शामिल किया गया है। साथ ही, जिन पंचायतों में एक भी घटना नहीं होगी, उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।

हार्वेस्टर मशीनों के लिए स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम जरूरी

फसल कटाई के दौरान कंबाइन हार्वेस्टर मशीनों का उपयोग बड़े पैमाने पर होता है। इसे नियंत्रित करने के लिए जिले में चलने वाले सभी हार्वेस्टरों में स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम यानी एसएमएस लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। जो मशीन मालिक इस नियम का पालन नहीं करेंगे, उनके खिलाफ प्रशासनिक स्तर पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

बायोएनर्जी यूनिट को बेचे जा सकेंगे अवशेष

किसानों को पराली जलाने से रोकने और उन्हें आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए जिले में कुल 13 बायोएनर्जी यूनिट सक्रिय हैं। ये इकाइयां किसानों से सोयाबीन और मक्का के फसल अवशेषों की खरीदी कर रही हैं, जिससे अन्नदाता खेतों में आग लगाने के बजाय कचरे का सही उपयोग कर सकें।

दूसरी ओर, इस साल जिले में औसत 882 मिलीमीटर बारिश के मुकाबले 796.25 मिलीमीटर वर्षा ही दर्ज की गई है। कम बारिश की स्थिति को देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को गेहूं की ऐसी किस्में चुनने की सलाह दी है जिनमें कम पानी की जरूरत पड़े। इसके अलावा सरसों, चना और मसूर जैसी फसलों की बोवनी करने पर भी जोर दिया जा रहा है।