कदवाया का प्रसिद्ध बीजासन माता मंदिर
ईसागढ़ विकासखंड के अंतर्गत आने वाले कदवाया क्षेत्र में स्थित बीजासन माता का मंदिर इलाके के हजारों लोगों की अटूट आस्था का मुख्य केंद्र है। यहाँ आने वाले भक्तों का मानना है कि माता दरबार में सच्ची श्रद्धा से मांगने पर हर मनोकामना पूरी होती है।
भरे जाते हैं जवारे और लगता है मेला
इस पावन स्थल पर साल में दोनों बार यानी चैत्र और शारदीय नवरात्र के पावन अवसरों पर भव्य मेलों का आयोजन किया जाता है। इस दौरान माता के दर्शन और पूजन के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु कदवाया पहुँचते हैं।
स्वप्न से जुड़ी है स्थापना की कहानी
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, लगभग तीन सौ साल पहले उत्तर प्रदेश के सतलौन निवासी दुलारे पंडा को बार-बार यह सपना आया कि जमीन के भीतर बीजासन देवी की प्रतिमा दबी हुई है। उन्हीं संकेतों के आधार पर जब खुदाई की गई, तो वहाँ से माता की दिव्य मूर्ति प्रकट हुई।
इसके बाद दुलारे पंडा उस प्रतिमा को बैलगाड़ी में सवार कर कदवाया की तरफ चल पड़े। मार्ग में रात्रि होने पर उन्होंने एक कुएं और चौतरे के पास विश्राम किया, लेकिन अगली सुबह जब यात्रा दोबारा शुरू करने की कोशिश की गई, तो बैलगाड़ी के पहिए आगे नहीं बढ़े।
तमाम कोशिशों के बावजूद जब बैलगाड़ी टस से मस नहीं हुई, तो इसे देवी की ही मर्जी मान लिया गया और प्रतिमा को उसी स्थान पर स्थापित कर दिया गया, जो आज बीजासन माता धाम के रूप में विख्यात है।
सोने-चांदी की आंखें चढ़ाने की अनोखी परंपरा
मंदिर परिसर में जवारे अर्पित करने की परंपरा के साथ-साथ एक और खास मान्यता जुड़ी हुई है। श्रद्धालुओं में अटूट विश्वास है कि माता की कृपा से आंखों से जुड़ी तमाम परेशानियों में आराम मिलता है, जिसके चलते मन्नत पूरी होने पर भक्त यहाँ सोने और चांदी की आंखें अर्पित करते हैं।






टिप्पणियाँ 2
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। ग्वालियर चंबल टाइम्स पर भरोसा बना रहता है।
अंचल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!