शिवपुरी जिले के ऐतिहासिक नरवर किले की कचहरी से साढ़े तीन टन वजनी तोप चोरी हुए एक महीना बीत चुका है। इस हाई-प्रोफाइल मामले में पुलिस की जांच के तार राजस्थान तक जुड़ चुके हैं। कार्रवाई के दौरान पुलिस ने दो संदिग्धों को गिरफ्तार किया है, जिनसे पूछताछ की जा रही है और वारदात में इस्तेमाल किया गया वाहन भी जब्त किया गया है।

कचहरी परिसर में कम मिलीं तोपें, नंबरिंग और गिनती में बड़ा अंतर

घटनास्थल का जायजा लेने पर यह बात सामने आई कि मामला सिर्फ एक तोप चोरी होने तक सीमित नहीं है। किले की कचहरी परिसर में तोपों की नंबरिंग 26 तक दर्ज है, लेकिन वर्तमान में वहां केवल 13 तोपें ही मौजूद हैं। इसके अलावा वर्ष 2011 में चोरी हुई और बाद में बरामद की गई एक तोप फिलहाल नरवर थाने में सुरक्षित रखी हुई है।

इस हिसाब से कुल 15 तोपों का ही पता चल पा रहा है, जबकि कागजों और नंबरिंग के अनुसार बाकी तोपों का कोई अता-पता नहीं है। वर्ष 2007 में भी एक तोप चोरी होने की बात सामने आई थी, जिसका स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिलता है। ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि वर्षों से गायब अन्य ऐतिहासिक तोपें आखिरकार कहां गईं।

शोधकर्ताओं के आंकड़ों और इतिहास में विरोधाभास

नरवर किले पर शोध करने वाले डॉ. मनोज माहेश्वरी ने वर्ष 1998 में अपनी पीएचडी के दौरान करीब 1985 में किले का मुआयना किया था। उनके मुताबिक उस समय उन्होंने किले में 18 तोपें देखी थीं, जो बाद के दस्तावेजीकरण में घटकर 14 रह गईं। वहीं, स्थानीय इतिहास के जानकार बसर अली का कहना है कि राजा-महाराजाओं के शासनकाल में यहां करीब 26 तोपें मौजूद रही होंगी।

लोह अयस्क और प्राचीन तोप निर्माण का केंद्र रहा है नरवर

इतिहासकारों के अनुसार नरवर के आसपास के क्षेत्रों जैसे मगरौनी, करई और सीहोर में प्रचुर मात्रा में लोह अयस्क उपलब्ध था। इसी वजह से मुगल काल से लेकर सिंधिया रियासत के समय तक यहां तोपों के निर्माण का कार्य किया जाता था। यहां बनने वाली तोपें तत्कालीन समय में जयपुर और ग्वालियर तक आपूर्ति की जाती थीं।

फिलहाल पुलिस गिरफ्तार किए गए संदिग्धों से पूछताछ के जरिए चोरी हुई भारी-भरकम तोप और इस गिरोह के अन्य सदस्यों की तलाश में जुटी हुई है। इस घटना के बाद पुरातत्व संपदा की सुरक्षा और उनके संपूर्ण दस्तावेजी ऑडिट की मांग भी जोर पकड़ने लगी है।