श्योपुर की एक अदालत ने सात वर्षीय मासूम बच्ची से छेड़छाड़ और लैंगिक हमले के एक गंभीर मामले में कड़ा फैसला सुनाया है। तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश बबीता होरा की अदालत ने 62 वर्षीय प्रहलाद आदिवासी को दोषी करार देते हुए दस साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही, दोषी पर पांच हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है।

क्या था पूरा मामला?

विशेष अभियोजन पक्ष द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, यह घटना 27 मार्च 2026 की सुबह करीब 7 बजे की है। ग्राम कुड़ायथा निवासी प्रहलाद आदिवासी ने अपने घर के बाहर खेल रही सात वर्षीय बच्ची को पांच रुपये का लालच दिया। लालच देकर वह बच्ची को फुसलाकर अपने घर के एक कमरे में ले गया, जहां उसने मासूम के साथ अश्लील हरकतें कीं।

आरोपी के चंगुल से छूटने के बाद, डरी हुई बच्ची तुरंत रोते हुए अपनी मां के पास पहुंची और उसे पूरी आपबीती सुनाई। दोपहर में जब बच्ची के पिता मजदूरी से लौटे, तो उन्हें भी इस घटना की जानकारी दी गई। इसके बाद, माता-पिता पीड़ित बच्ची को लेकर बड़ौदा थाने पहुंचे और आरोपी प्रहलाद आदिवासी के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई।

पुलिस की कार्रवाई और अदालत का रुख

पुलिस ने शिकायत के आधार पर तत्काल कार्रवाई करते हुए आरोपी प्रहलाद पुत्र नैनगा आदिवासी (62) निवासी ग्राम कुड़ायथा के खिलाफ पॉक्सो एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। आरोपी को गिरफ्तार कर जांच पूरी की गई और न्यायालय में आरोप पत्र प्रस्तुत किया गया।

अदालत ने सभी साक्ष्यों और गवाहों के बयानों पर विचार करने के बाद प्रहलाद आदिवासी को दोषी पाया। कोर्ट ने उसे भारतीय न्याय संहिता की धारा 127 (2) के तहत छह माह के सश्रम कारावास और एक हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया। इसके अतिरिक्त, BNS 2023 की धारा 65 (2)/62 के तहत दस वर्ष के सश्रम कारावास और चार हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई गई।

अदालत ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, "पीड़ित बच्ची की उम्र 12 वर्ष से कम थी और उस पर बलात्कार के प्रयास के साथ-साथ गंभीर लैंगिक हमला किया गया था, जो अक्षम्य है। ऐसे घृणित और अमानवीय अपराधों की सभ्य समाज में कोई जगह नहीं हो सकती। जब एक मासूम और अबोध बच्ची के साथ ऐसा कृत्य किया जाता है, तो यह न केवल उस बच्ची के मानसिक और शारीरिक अस्तित्व को छलनी करता है, बल्कि पूरे समाज की चेतना को झकझोर देता है।"

न्यायालय ने आगे कहा कि ऐसे मामलों में अदालत का यह त्वरित और कठोर फैसला समाज में एक कड़ा संदेश देगा और अपराधियों में कानून का खौफ पैदा करेगा। यह निर्णय समाज में बाल अपराधों के प्रति बढ़ती चिंता और न्यायपालिका की दृढ़ता को दर्शाता है।