ग्वालियर-चंबल अंचल के मुरैना जिले में एक ऐसा गांव बसा है, जहां देशभक्ति महज नारों और उत्सवों तक सीमित नहीं है। इस गांव की हर गली और हर घर का नाता सीधे तौर पर देश की रक्षा सेनाओं से जुड़ा हुआ है। काजी बसई नाम के इस गांव में शायद ही कोई ऐसा परिवार मिलेगा, जिसके सदस्य ने सेना, सीमा सुरक्षा बल या अन्य सुरक्षा एजेंसियों में अपनी सेवाएं न दी हों।

पीढ़ियों से चली आ रही है सैन्य सेवा की परंपरा

यहाँ के निवासियों के लिए फौज में जाना केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि परिवार और देश के प्रति एक पवित्र कर्तव्य माना जाता है। बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक, हर पीढ़ी ने सरहद पर पहरा देकर देश की सुरक्षा को सर्वोपरि रखा है। आज भी इस गांव के कई जवान देश के विभिन्न हिस्सों में मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं।

विश्व युद्ध से लेकर कारगिल और ऑपरेशन तक भागीदारी

काजी बसई के वीरों का इतिहास बहुत पुराना और गौरवशाली है। इस गांव के जवानों ने प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के अलावा साल 1962 के चीन युद्ध, 1965 एवं 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध, श्रीलंका में शांति सेना अभियान, पंजाब के आतंकवाद विरोधी मोर्चे, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों और कारगिल की जंग में अदम्य साहस का परिचय दिया है।

देश की हिफाजत के लिए इस माटी के 11 वीर सपूतों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है, जिनमें विभिन्न समुदायों के जवान शामिल रहे हैं।

जर्मनी तक गूंजी गांव के सैनिक की शहादत की गूंज

पूर्व सैनिकों और स्थानीय बुजुर्गों के संस्मरणों के अनुसार, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सिंधिया स्टेट की सेना से जुड़े अब्दुल वासिद ने जर्मनी में लड़ते हुए शहादत दी थी, जिनकी यादें आज भी वहां संजोई हुई हैं। इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध में भी गांव के डेढ़ दर्जन के करीब लोग शामिल हुए थे, जो युद्ध समाप्ति के बाद सकुशल अपने गांव लौटे थे।

स्थानीय निवासी और पूर्व सैनिक हाजी मोहम्मद रफी जैसे दिग्गजों ने 1965 और 1971 की जंगों को अपनी आंखों से देखा है और उनमें सीधे भाग लिया है। आज भी जब वे उन दिनों को याद करते हैं, तो अंचल का मस्तक गर्व से ऊंचा हो जाता है। काजी बसई गांव आज पूरे देश के लिए प्रेरणास्त्रोत बना हुआ है।