ग्वालियर के लश्कर क्षेत्र में स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय व्यापारिक समुदाय के लिए अटूट विश्वास का केंद्र भी बना हुआ है। शहर के बाजारों के खुलने से पहले ही सुबह सवेरे यहां व्यापारियों की आवाजाही शुरू हो जाती है।

साल के 365 दिन निभाई जाती है यह परंपरा

सुबह करीब साढ़े छह बजे जब बाजार पूरी तरह जागते भी नहीं हैं, तब कई कारोबारी पूजा की थाली के साथ अपने शोरूम, दफ्तर या तिजोरी की चाबी लेकर मंदिर पहुंचते हैं। वे भगवान का जलाभिषेक करते हैं, बेलपत्र अर्पित करते हैं और इसके बाद चाबी को शिवलिंग से स्पर्श कराते हैं।

शिवलिंग से चाबी छूने के बाद व्यापारी उसे माथे से लगाते हैं और फिर अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की ओर रवाना होते हैं। सराफा बाजार, टोपी बाजार और महाराज बाड़े के कई व्यापारी इस नियम को साल के 365 दिन बिना नागा निभाते आ रहे हैं।

कारोबार में बरकत की है मान्यता

स्थानीय दुकानदारों का मानना है कि बाबा अचलेश्वर के चरणों से स्पर्श कराई गई चाबी से दुकान या तिजोरी खोलने पर कारोबार में बरकत बनी रहती है। गहना ज्वेलर्स के संचालक राकेश मंगल का कहना है कि उनके क्षेत्र में यह पुरानी परंपरा लगातार चली आ रही है और व्यापारी दुकान खोलने से पहले मंदिर जरूर आते हैं।

सराफा कारोबारी विनय सिंगल भी इसी मान्यता का पालन करते हैं। उनका कहना है कि वे नियमित रूप से दुकान के संचालन से पहले भगवान के दर्शन करते हैं और चाबी उनके चरणों में रखते हैं। ग्वालियर के कारोबारियों के बीच यह लोक आस्था पीढ़ियों से चली आ रही है।

अचलेश्वर नाम के पीछे का दिलचस्प इतिहास

इस मंदिर और इसके नाम के पीछे भी एक पुराना इतिहास जुड़ा हुआ है। सिंधिया काल के दौरान लश्कर इलाके में सड़क निर्माण का कार्य चल रहा था, तब यह शिवलिंग रास्ते के बीच आ गया था। जब इसे हटाने का प्रयास किया गया तो पिंडी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई।

कहा जाता है कि पिंडी को हटाने के लिए पहले मजदूरों और फिर हाथियों की मदद ली गई थी। इसे जंजीरों से बांधकर खींचने की कोशिश भी असफल रही और खुदाई करने पर भी इसका छोर नहीं मिला। इसके बाद खुदाई रोककर शिवलिंग को यथावत छोड़ दिया गया।

चूंकि यह शिवलिंग अपनी जगह से अचल रहा, इसलिए इसका नाम अचलेश्वर पड़ गया। व्यापारी इसी 'अचल' स्वरूप से अपनी कमाई और कारोबार की स्थिरता की कामना जोड़ते हैं और रोजाना अपनी दुकान की जिम्मेदारी भगवान को सौंपने भाव के साथ मंदिर पहुंचते हैं।