ग्वालियर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति के पैर में फ्रैक्चर के इलाज के लिए स्वास्थ्य बीमा दावा सिर्फ इस वजह से अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह मधुमेह से पीड़ित है। आयोग ने इस तरह के दावे को रोकना अनुचित बताया है, क्योंकि वर्तमान जीवनशैली में मधुमेह एक सामान्य स्वास्थ्य समस्या बन गई है।

बीमा कंपनी को फटकार और भुगतान का आदेश

जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शर्मा और सदस्य रेवती रमण मिश्रा की पीठ ने रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के खिलाफ फैसला सुनाते हुए बीमाधारक के पक्ष में निर्णय दिया। आयोग ने टिप्पणी की कि ठोस चिकित्सीय प्रमाण के अभाव में केवल तकनीकी आधार पर बीमा दावे को अस्वीकार करना उपभोक्ता के प्रति अन्याय और सेवा में गंभीर त्रुटि मानी गई है।

क्या था पूरा मामला?

ग्वालियर निवासी सुनील गुप्ता ने रिलायंस जनरल इंश्योरेंस से एक हेल्थ पॉलिसी ली थी। 16 सितंबर 2024 को एक दुर्घटना में गिरने से उनके टखने के ऊपर गंभीर फ्रैक्चर हो गया। उन्हें सर्वोदय हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां ऑपरेशन के जरिए उनके पैर में प्लेट डाली गई। इलाज पूरा होने के बाद, उन्होंने अस्पताल के खर्चों के लिए बीमा कंपनी के पास दावा प्रस्तुत किया।

हालांकि, बीमा कंपनी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि सुनील गुप्ता को पॉलिसी लेने से पहले से ही मधुमेह था, जिसकी जानकारी उन्होंने नहीं दी थी। इसे पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन मानते हुए कंपनी ने भुगतान से मना कर दिया।

आयोग ने पूछा - फ्रैक्चर का शुगर से क्या संबंध?

मामले की सुनवाई के दौरान, आयोग ने बीमा कंपनी से पूछा कि आखिर पैर के फ्रैक्चर का मधुमेह से क्या सीधा संबंध है। आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी कोई ऐसा चिकित्सीय रिकॉर्ड या विशेषज्ञ राय प्रस्तुत नहीं कर पाई, जो यह सिद्ध कर सके कि मधुमेह के कारण यह इलाज प्रभावित हुआ या दावा अमान्य हो गया। आयोग ने स्पष्ट किया कि हल्के स्तर का मधुमेह होना सामान्य है और केवल इसी आधार पर दुर्घटना से हुए फ्रैक्चर का बीमा दावा रोकना पूरी तरह से अनुचित है।

आयोग ने रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी को आदेश दिया है कि वह 45 दिनों के भीतर परिवादी सुनील गुप्ता को इलाज का खर्च 1 लाख 27 हजार 812 रुपये, मानसिक प्रताड़ना के लिए 5 हजार रुपये और वाद व्यय के रूप में 2 हजार रुपये का भुगतान करे।

यह निर्णय उन लाखों बीमाधारकों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, जिनके दावे अक्सर तकनीकी कारणों या सामान्य पूर्व-मौजूदा बीमारियों का हवाला देकर खारिज कर दिए जाते हैं। आयोग ने स्पष्ट संदेश दिया है कि बीमा कंपनियां ठोस चिकित्सीय आधार के बिना मनमाने ढंग से दावे खारिज नहीं कर सकतीं।