ग्वालियर के बिलौआ-रफादपुर क्षेत्र में अवैध खनन और करोड़ों रुपए की रॉयल्टी व पेनल्टी वसूली से जुड़े एक मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने तत्काल प्रभाव से 16 खदानों में खनन कार्य पर रोक लगा दी है।

न्यायालय ने सरकारी अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि जनता के टैक्स के पैसों से वेतन पाने वाले अधिकारी खनन माफिया के हित में काम कर रहे हैं। यह रवैया बिल्कुल अस्वीकार्य है।

एसडीएम पर भ्रामक रिपोर्ट पेश करने का आरोप

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि डबरा एसडीएम रुपेश रतन सिंघई ने बिना जमीनी हकीकत जांचे न्यायालय में भ्रामक रिपोर्ट पेश की। इसे अदालत ने गंभीरता से लेते हुए उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए हैं। वहीं, अवैध खनन को रोकने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी ग्वालियर कलेक्टर रुचिका चौहान को सौंपी गई है।

अफसरों की 'कुंभकर्णी नींद' पर सवाल

अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि वर्ष 2017 में जारी करोड़ों रुपए की रॉयल्टी और पेनल्टी के नोटिसों पर नौ साल बीत जाने के बाद भी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। कोर्ट ने इस देरी को अफसरों की 'कुंभकर्णी नींद' करार देते हुए कार्रवाई में हो रही देरी पर कड़े सवाल उठाए।

सुनवाई के दौरान कलेक्टर रुचिका चौहान ने बताया कि सभी ई-चेक पोस्ट पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। जब कोर्ट ने इन कैमरों के फुटेज की निगरानी के बारे में पूछा, तो माइनिंग अधिकारी ने स्वीकार किया कि नियमित रूप से मॉनिटरिंग नहीं की जाती है।

इस पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए सभी ई-चेक पोस्ट के डीवीआर और सीसीटीवी फुटेज को जब्त कर 17 जुलाई को सीलबंद लिफाफे में कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि कोई फुटेज गायब पाया गया तो इसे सबूत मिटाने की साजिश माना जाएगा।

कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि बिना 'नो-ड्यूज' प्रमाणपत्र के कई खदानों की लीज का नवीनीकरण कैसे कर दिया गया। इस मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को निर्धारित की गई है, जिसमें प्रशासन को अपनी कार्रवाई रिपोर्ट और सीसीटीवी फुटेज कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।