देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर सपूतों की गाथाएं आज भी हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देती हैं। ग्वालियर अंचल से ताल्लुक रखने वाले राजपूताना रेजीमेंट के हवलदार सरमन सिंह सेंगर ने कारगिल युद्ध के दौरान ऐसा ही पराक्रम दिखाया था। कम उम्र में ही सेना का दामन थामने वाले सरमन ने विपरीत परिस्थितियों और दुर्गम पहाड़ियों के बीच अजेय साहस का परिचय दिया।

बचपन से था देशसेवा का जज्बा

सरमन सिंह का जन्म वर्ष 1963 में उत्तर प्रदेश के जालौन में हुआ था। उनके पिता मध्य प्रदेश पुलिस में अपनी सेवाएं दे रहे थे, जिसके चलते उनका पूरा परिवार ग्वालियर में आकर बस गया। चार बहनों के बाद इकलौते भाई होने के कारण वह पूरे परिवार के बेहद लाड़ले थे और घर में उन्हें स्नेह से 'लल्लू' पुकारा जाता था। महज 17 वर्ष की कच्ची उम्र में बिना किसी को बताए वे मुरार छावनी पहुंच गए और सेना में भर्ती की प्रक्रिया पूरी की। उनके भीतर कूट-कूट कर भरे देशप्रेम को देखकर आखिरकार उनका चयन भारतीय सेना में हो गया।

टाइगर हिल पर लिखी शौर्य की इबारत

वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने लगभग पंद्रह से बीस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित दुर्गम चोटियों पर दुश्मन का मुकाबला किया। सरमन सिंह सेंगर की टुकड़ी को तोलोलिंग और टाइगर हिल क्षेत्र से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने का बेहद कठिन कार्य सौंपा गया था। तोलोलिंग पर कब्जे के दौरान वे घायल भी हो गए थे, लेकिन राष्ट्र के प्रति कर्तव्य ने उन्हें पीछे हटने नहीं दिया। उन्होंने अपनी चोटों को छिपाकर मेडिकल परीक्षण पास किया और टाइगर हिल की निर्णायक लड़ाई में हिस्सा लिया।

सत्ताइस और अट्ठाइस जून 1999 की दरमियानी अवधि में उनकी टुकड़ी टाइगर हिल के शिखर पर पहुंच गई। सेक्शन लीडर के तौर पर मोर्चा संभालते हुए उन्होंने शीर्ष पर भारतीय तिरंगा फहराया। तिरंगा फहराए जाने के बाद गुफाओं में छिपे छिपे हुए दुश्मनों ने अचानक हमला कर दिया। हवलदार सरमन ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए कई घुसपैठियों को ढेर कर दिया। इसी भीषण संघर्ष के दौरान एक बम फटने से वे गंभीर रूप से जख्मी हो गए और वीरगति को प्राप्त हुए। बाद में सैन्य चिकित्सा परीक्षण में उनके शरीर से बारह गोलियां निकाली गईं।

शहीद की पार्थिव देह के साथ पहुंची आखिरी चिट्ठी

इस अंचल के लिए यह बलिदान जितना गौरवशाली था, उतना ही मर्माहत करने वाला भी रहा। जब शहीद सरमन सिंह का पार्थिव शरीर उनके घर पहुंचा, तो उसी वक्त कारगिल के मोर्चे से उनके द्वारा भेजी गई आखिरी चिट्ठी भी उनकी पत्नी के हाथों में पहुंची। उस खत में उन्होंने अपनी कुशलता का संदेश लिखा था, जिसे पढ़कर पूरा परिवार आज भी सिहर उठता है।