गुना जिले के भदौरा वन क्षेत्र में हुए बहुचर्चित तेंदुए के शिकार के मामले में अदालत ने बुधवार को कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने इस क्रूर वारदात को अंजाम देने वाले आरोपियों की ओर से दायर की गई जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। वन विभाग द्वारा इस मामले में पुख्ता सबूत जुटाए गए थे, जिसके आधार पर आरोपियों को राहत नहीं मिल सकी।

क्या था पूरा मामला और कैसे हुआ खुलासा

घटना की शुरुआत 30 जुलाई को हुई थी जब गुना उत्तर वन परिक्षेत्र की भादौरा सब रेंज के अंतर्गत आगरा-हंसली के जंगलों में ग्रामीणों ने एक तेंदुआ का शव पड़ा देखा। ग्रामीणों ने तुरंत इसकी सूचना स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों को दी। सूचना मिलते ही अमला मौके पर पहुंचा और स्थिति का जायजा लिया।

मौके पर मिले तेंदुए के शव की हालत बेहद भयावह और क्षत-विक्षत थी। उसके चारों पैर, सिर और शरीर की खाल गायब थी, केवल धड़ ही वहां बचा हुआ था। इस क्रूरता को देखकर शुरुआती तौर पर ही यह स्पष्ट हो गया था कि वन्यजीव तस्करों ने नाखून, दांत और खाल हासिल करने के लिए इस वारदात को अंजाम दिया है।

वन विभाग की जांच और चार आरोपियों की गिरफ्तारी

मामले की गंभीरता को देखते हुए शिवपुरी सर्किल के सीसीसीएफ आदर्श श्रीवास्तव और गुना डीएफओ अक्षय राठौर के मार्गदर्शन में विशेष जांच शुरू की गई। वन विभाग की टीम ने डॉग स्क्वॉड की मदद ली और मुखबिर तंत्र को सक्रिय किया। तकनीकी साक्ष्यों और छानबीन के आधार पर अवैध शिकार में संलिप्त चार संदिग्धों की पहचान कर ली गई थी।

कार्रवाई के दौरान वन विभाग ने चारों आरोपियों खुमानसिंह पुत्र रावला बारेला, रमेश उर्फ पप्पू पुत्र करणसिंह बारेला, लखन पुत्र गणपत बारेला और डूमसिंह पुत्र काशीराम बारेला को धर दबोचा। ये सभी आरोपी ग्राम हांसली के रहने वाले हैं। तलाशी के दौरान इनके कब्जे से तीन कट्टों में छिपाकर रखे गए तेंदुए के अंग, पैर और खाल भी बरामद कर ली गई थी।

अदालत ने गंभीर प्रकृति का अपराध मानते हुए ठुकराई अर्जी

गिरफ्तारी के बाद आरोपी डूम सिंह बरेला और रमेश बरेला के वकीलों ने अदालत में जमानत के लिए आवेदन पेश किया था। बुधवार को इस याचिका पर सुनवाई हुई। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने माना कि आरोपियों ने एक संरक्षित वन्यजीव का शिकार कर बेहद गंभीर अपराध किया है, इसलिए उन्हें जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता।