दतिया मेडिकल कॉलेज में नर्सिंग अधीक्षक के पद पर हुई नियुक्ति को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने चयन प्रक्रिया में अनियमितता पाते हुए विजि अवस्थी की नियुक्ति को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है।

क्या था पूरा मामला और क्यों पहुंची याचिका कोर्ट

इस मामले में याचिकाकर्ता सविता पांडेय ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती दी थी। कॉलेज द्वारा जारी विज्ञापन में एमएससी नर्सिंग, बीएससी नर्सिंग या पोस्ट बेसिक बीएससी नर्सिंग जैसी योग्यताएं निर्धारित की गई थीं, लेकिन चयन के दौरान विजि अवस्थी को पीएचडी डिग्री के एवज में 10 अतिरिक्त अंक प्रदान किए गए थे।

अतिरिक्त अंक मिलने के बाद विजि अवस्थी के कुल 79 अंक हो गए थे, जिसके आधार पर 9 मई 2019 को उन्हें नर्सिंग अधीक्षक के पद पर नियुक्त कर दिया गया था। सुनवाई के दौरान अदालत में यह बात सामने आई कि मूल विज्ञापन में पीएचडी के लिए किसी भी तरह के अतिरिक्त अंक देने का कोई प्रावधान नहीं था।

अंक कम होने से बदली पूरी मेरिट सूची

न्यायालय की समीक्षा में यह स्पष्ट हुआ कि यदि विजि अवस्थी के कुल 79 अंकों में से अवैध रूप से जोड़े गए 10 अंक हटा दिए जाएं, तो उनके अंक घटकर 69 रह जाएंगे। इसके विपरीत, याचिकाकर्ता सविता पांडेय ने अपनी निर्धारित योग्यताओं के दम पर 75 अंक प्राप्त किए थे।

यदि अतिरिक्त अंक नहीं जोड़े जाते, तो सविता पांडेय मेरिट सूची में सबसे आगे रहतीं और चयन की हकदार होतीं।

हाईकोर्ट की दो टूक: विज्ञापन के बाद नहीं बदल सकते नियम

मामلا की सुनवाई करते हुए जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की एकल पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के पुराने फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि भर्ती के लिए विज्ञापन जारी होने और चयन प्रक्रिया शुरू होने के पश्चात चयन के मापदंडों में बदलाव नहीं किया जा सकता है।

अदालत ने यह भी साफ किया कि केवल उच्च शिक्षा या डिग्री होना ही किसी व्यक्ति को नियुक्ति का अधिकार नहीं देता, जब तक कि इसके लिए विज्ञापन में विशेष लाभ या अतिरिक्त अंकों का स्पष्ट प्रावधान न किया गया हो।

हाईकोर्ट के इस कड़े फैसले के बाद तत्कालीन डीन डॉ. राजेश गौर के कार्यकाल में की गई यह विवादास्पद नियुक्ति अब समाप्त हो गई है, जिससे स्थानीय स्वास्थ्य और चिकित्सा हलकों में हलचल मच गई है।