ग्वालियर-चंबल आंचल के डबरा में जमीयत उलमा ए हिंद की स्थानीय इकाई ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के प्रस्तावित मसौदे के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है। संगठन से जुड़े पदाधिकारियों और सदस्यों ने राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन प्रशासनिक अधिकारी को सौंपा, जिसमें यूसीसी के कई प्रावधानों पर गहरी आपत्ति जताई गई है।

मौलिक अधिकारों और सांस्कृतिक विविधता की सुरक्षा की मांग

प्रस्तुत किए गए ज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि यह विरोध प्रदर्शन मुस्लिम समाज, जमीयत उलेमा मध्य प्रदेश और क्षेत्र के कई चिंतित नागरिकों की ओर से किया जा रहा है। संगठन का मुख्य उद्देश्य भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक सद्भाव को सुरक्षित रखना है। साथ ही यह भी साफ किया गया कि इस कदम का मकसद किसी भी धर्म या समुदाय का विरोध करना नहीं है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों का संरक्षण करना है।

शरीयत कानून और समानता के सिद्धांत का दिया हवाला

संगठन ने अपने ज्ञापन में संविधान के अनुच्छेद 44 और अनुच्छेद 37 का जिक्र करते हुए कहा कि नीति-निर्देशक तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, इसलिए कानून निर्माण के दौरान मौलिक अधिकारों को हमेशा सर्वोपरि रखा जाना चाहिए। इसके अलावा मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) की कानूनी मान्यता का हवाला देते हुए विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों में इसे धार्मिक आस्था का अहम हिस्सा बताया गया। संगठन ने सवाल उठाया कि जब जनजातियों को परंपराओं के आधार पर छूट मिल सकती है, तो मुस्लिम समाज की व्यक्तिगत विधियों के साथ अलग रुख क्यों अपनाया जा रहा है।

विधि आयोग की रिपोर्ट और व्यापक जन-परामर्श की मांग

ज्ञापन के माध्यम से 21वें विधि आयोग की वर्ष 2018 की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया, जिसमें व्यक्तिगत कानूनों में सुधार लाने को बेहतर विकल्प बताया गया था। जमीयत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि यूसीसी को लेकर पर्याप्त जन-परामर्श नहीं किया गया है। संगठन ने मांग की है कि इस संवेदनशील विषय पर धार्मिक संगठनों, विधि विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और नागरिक समाज के साथ खुला संवाद किया जाए।

कार्यक्रम के दौरान ज्ञापन सौंपने वालों में राजा अज़हर अली, उजमा एहमद, इब्राहिम खान, इस्माइल खान, इरफान अली और अनीष मोहम्मद समेत संगठन के तमाम गणमान्य सदस्य मौजूद रहे।