कारगिल युद्ध को भले ही दो दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन उस भीषण जंग का हर एक मंजर आज भी आंखों के सामने ताजा हो जाता है। यह कहना है भिंड के रहने वाले कैप्टन बादशाह खान का, जिन्होंने कारगिल की सामरिक रूप से बेहद अहम जुवैर हिल को दुश्मनों के चंगुल से मुक्त कराने की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी। युद्ध की उन यादों को ताजा करते हुए वे बताते हैं कि वह महज एक पहाड़ी पर कब्जे की लड़ाई नहीं थी, बल्कि हर एक कदम पर जिंदगी और मौत का फैसला होना था।
12 घंटे की कठिन चढ़ाई और बर्फीले रास्ते
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने अनुभवों को साझा करते हुए कैप्टन बादशाह खान ने बताया कि उस समय वे 22 ग्रेनेडियर्स में तैनात थे। तत्कालीन लेफ्टिनेंट कर्नल अजीत सिंह के नेतृत्व में चार्ली एचएमसी कंपनी को जुवैर हिल पर फतह हासिल करने का कठिन जिम्मा सौंपा गया था। इस अभियान की शुरुआत शाम पांच बजे की गई थी। लगभग साढ़े पांच हजार फीट ऊंची बर्फीली और खड़ी पहाड़ी पर चढ़ना किसी चुनौती से कम नहीं था। कई स्थानों पर जवानों को केवल रस्सियों के सहारे ऊपर की ओर बढ़ना पड़ा।
कड़ाके की ठंड और दुर्गम रास्ते के कारण जवानों के लिए एक-एक कदम बढ़ाना मुश्किल हो रहा था। इस चढ़ाई के दौरान 80 जवानों के दल में से केवल 40 ही जवान ही तय समय पर चोटी तक पहुंच पाए थे। पाकिस्तानी सैनिक पहाड़ी की चोटी से लगातार स्नाइपर फायरिंग कर रहे थे। चारों तरफ गोलियों की सरसराहट के बीच भारतीय जवानों ने बिना रुके लगभग 12 घंटे तक लगातार ऊपर की तरफ मार्च किया।
एक नारे ने बदल दी थी युद्ध की बाजी
इस विकट संघर्ष के दौरान एक ऐसा वाकया भी आया जिसने पाकिस्तानी सेना को असमंजस में डाल दिया। भारी गोलाबारी के बीच लेफ्टिनेंट कर्नल अजीत सिंह ने 'नारा-ए-तकबीर' का उद्घोष किया, जिसके जवाब में सभी जवानों ने 'अल्लाह हू अकबर' के नारे लगाए। इस अचानक हुई गूंज से पाकिस्तानी सैनिक कुछ पलों के लिए भ्रमित हो गए और उन्हें लगा कि शायद उनकी अपनी कोई援ी टुकड़ी आ गई है।
दुश्मन के खेमे में फैले इसी भ्रम के कुछ पलों ने भारतीय जवानों को संभलने और निर्णायक बढ़त बनाने का शानदार मौका दे दिया। युद्ध के मैदान में ये कुछ सेकंड ही पूरी बाजी पलटने के लिए काफी साबित हुए।
जब खत्म होने लगा था गोला-बारूद
जुवैर हिल की इस ऐतिहासिक चढ़ाई के दौरान एक स्थिति ऐसी भी आई जब भारतीय टुकड़ी का गोला-बारूद समाप्त होने की कगार पर पहुंच गया था। हालांकि ऐसी विषम परिस्थितियों में भी सैनिकों और कमांडर ने हौसला नहीं खोया। लेफ्टिनेंट कर्नल अजीत सिंह ने अपनी राइफल की मैग्जीन से गोलियां निकालकर अपनी जेब में रख ली थीं, ताकि जरूरत पड़ने पर उनका सही इस्तेमाल किया जा सके। 18 साथियों का बलिदान और अटूट देशभक्ति के दम पर आखिरकार जुवैर हिल पर तिरंगा फहराकर ही दम लिया गया।






टिप्पणियाँ 2
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। ग्वालियर चंबल टाइम्स पर भरोसा बना रहता है।
अंचल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!