भिंड जिला मुख्यालय से करीब पंद्रह-सोलह किलोमीटर दूर स्थित नदरौली गांव में बरसात के मौसम में आवागमन किसी बड़े संघर्ष से कम नहीं होता है। पक्की सड़क के अभाव में यहां के निवासियों को हर कदम पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। रास्ते में आने वाली बैसली नदी बारिश के दिनों में विकराल रूप धारण कर लेती है, जिससे पूरे क्षेत्र का संपर्क मुख्य मार्ग से कट जाता है।
जान जोखिम में डालकर ट्यूब के सहारे नदी पार करने की मजबूरी
यह गांव बबेडी पंचायत के अंतर्गत आता है। यहां तक पहुंचने के लिए पराये के पुरा से आगे लगभग दो किलोमीटर तक खेतों की मेड़ों और कच्चे रास्तों से गुजरना पड़ता है। नदी का जलस्तर बढ़ने पर पैदल पार करना असंभव हो जाता है। ऐसी स्थिति में शिक्षक और ग्रामीण कभी-कभी ट्यूब या मटकों का सहारा लेते हैं, तो कई बार पानी का बहाव कम होने का घंटों इंतजार करना पड़ता है।
शिक्षकों का कहना है कि स्कूलों में ई-अटेंडेंस की व्यवस्था लागू होने के बाद से उनकी मुश्किलें और भी बढ़ गई हैं। उन्हें स्कूल परिसर से ही उपस्थिति दर्ज करानी होती है। ग्रामीण मदद के लिए ट्यूब लेकर आते हैं, तभी वे अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार कर पाते हैं। गांव में मोबाइल नेटवर्क की भी समस्या है, जिससे समय पर ऑनलाइन हाजिरी लगाने में भी दिक्कतें आती हैं।
स्कूली बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है बुरा असर
नदरौली गांव की आबादी करीब नौ सौ से एक हजार के बीच है और यहां लगभग दो सौ घर हैं। गांव में प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय संचालित हैं। प्राथमिक विद्यालय में लगभग चालीस और माध्यमिक विद्यालय में करीब तिरानवे विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
कक्षा आठवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद करीब पचास से साठ छात्र-छात्राओं को आगे की शिक्षा के लिए बबेडी की तरफ जाना पड़ता है। बरसात के दिनों में माता-पिता बच्चों को उफनती नदी पार नहीं कराते, जिससे उनकी पढ़ाई लंबे समय तक बाधित रहती है। ग्रामीणों के अनुसार पूर्व मंत्री के पैतृक गांव होने के बावजूद आज तक यहां न तो सड़क बन पाई है और न ही पुल का निर्माण हो सका है।






टिप्पणियाँ 2
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। ग्वालियर चंबल टाइम्स पर भरोसा बना रहता है।
अंचल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!