अशोकनगर जिले के पिपरई स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में इन दिनों चातुर्मास के पावन अवसर पर प्रतिदिन धर्मसभा का आयोजन किया जा रहा है। मुनि श्री दुर्लभसागर जी महाराज के सानिध्य में सजे इस धार्मिक दरबार में नगर के साथ-साथ दूर-दराज के ग्रामीण अंचलों से भी भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

अहिंसा का दायरा सिर्फ जीव रक्षा तक सीमित नहीं

धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री दुर्लभसागर जी महाराज ने कहा कि आम तौर पर लोग किसी भी जीव को शारीरिक चोट न पहुँचाने को ही अहिंसा मान लेते हैं, लेकिन अहिंसा का दायरा इससे बहुत अधिक व्यापक है। उन्होंने समझाया कि हर प्राणी को सुख और आराम मिले, ऐसा विचार मन में रखना तथा अपनी क्षमता के अनुसार उसकी मदद करना ही अहिंसा का वास्तविक स्वरूप है।

मुनि श्री ने आगे कहा कि किसी भी दुखी व्यक्ति की पीड़ा को समझना और उसके निवारण के लिए प्रयास करना मानव जीवन का मुख्य आचार होना चाहिए। जब समाज के लोग एक-दूसरे का सहयोग करते हैं, तो आपसी प्रेम और सद्भाव स्वतः ही मजबूत होने लगता है।

जयकारों से गूंजा मंदिर परिसर और लिए गए संकल्प

चातुर्मास के दौरान आयोजित इन आयोजनों से पूरा मंदिर परिसर जय जिनेंद्र के जयकारों और मुनि श्री की अमृतवाणी से गुंजायमान हो रहा है। प्रवचन सुनने आए श्रद्धालुओं ने अनुशासन के साथ उपदेशों को आत्मसात किया और दैनिक जीवन में संयम, परोपकार तथा अहिंसा के मार्ग पर चलने का संकल्प दोहराया।

त्रिस्तरीय शुद्धि से बनता है अहिंसामय जीवन

अहिंसा के गूढ़ रहस्यों को समझाते हुए मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि अहिंसा की शुरुआत बाह्य आचरण से नहीं बल्कि आंतरिक विचारों से होती है। एक सच्चे अहिंसक व्यक्ति के जीवन में मन की पवित्रता यानी ईर्ष्या व द्वेष से दूरी, वाणी का संयम यानी किसी को ठेस न पहुँचाना, और कर्म की शुद्धता यानी किसी को कष्ट न देने का भाव प्रमुख रूप से होना चाहिए।