अशोकनगर जिले के पचास से ज्यादा स्कूलों का हाल बेहाल
अशोकनगर क्षेत्र के सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के तमाम दावों की पोल ग्रामीण इलाकों के स्कूल खोल रहे हैं। जिले में पचास से अधिक ऐसे प्राथमिक विद्यालय संचालित हो रहे हैं, जहां पूरी शैक्षणिक व्यवस्था महज एक शिक्षक के भरोसे टिकी हुई है। इन विद्यालयों में नामांकित बच्चों को पहली से लेकर पांचवीं तक की कक्षाओं में एक साथ बैठाकर पढ़ाया जाता है।
बड़ागांव स्कूल की जमीनी हकीकत और प्रशासनिक जिम्मेदारियां
शासकीय प्राथमिक स्कूल बड़ागांव इस व्यवस्था की बानगी पेश करता है, जहां शिक्षक सुनील शर्मा अकेले ही 23 विद्यार्थियों को संभाल रहे हैं। पढ़ाने के अलावा उन्हें मध्यान्ह भोजन की देखरेख, यू-डाइस, समग्र आईडी और पोर्टल से जुड़े तमाम ऑनलाइन कार्य अकेले ही पूरे करने पड़ते हैं। प्रशासनिक कामकाज में समय बीत जाने के कारण बच्चों को मिलने वाला शिक्षण समय काफी कम हो जाता है।
इस स्कूल में पहले दो शिक्षक पदस्थ थे, किंतु जून 2025 में शिक्षिका कौशल्या करेले के निधन के बाद एक पद रिक्त हो गया था। हालांकि, ताज्जुब की बात यह है कि एजुकेशन पोर्टल 3.0 पर यह पद अभी भी भरा हुआ ही प्रदर्शित हो रहा है, जिससे वास्तविक स्थिति और ऑनलाइन आंकड़ों में बड़ा फर्क है।
बच्चों को घर बुलाने से लेकर पोर्टल की गड़बड़ियों तक की चुनौती
एकल शिक्षक होने के कारण यहां बच्चों की नियमित उपस्थिति बनाए रखना भी बड़ी चुनौती बन गया है। उपस्थिति कम होने पर शिक्षक को खुद गांव में जाकर बच्चों को घर से स्कूल लाना पड़ता है। इसके अलावा, पोर्टल पर रिक्त पद न दिखने के कारण न तो नियमित शिक्षक मिल पा रहे हैं और न ही अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था हो पा रही है।
रावसर, बासापुर और बाजिदपुर समेत जिले के अन्य ब्लॉकों में भी कमोबेश यही हालात हैं, अकेले अशोकनगर ब्लॉक में ही पच्चीस ऐसे विद्यालय हैं। शिक्षक के अवकाश पर जाने या किसी शासकीय प्रशिक्षण व बैठक में बाहर रहने पर इन विद्यालयों की पूरी व्यवस्था चरमरा जाती है।






टिप्पणियाँ 2
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। ग्वालियर चंबल टाइम्स पर भरोसा बना रहता है।
अंचल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!