Story detailsHeadline, summary, section, and byline.HeadlineSummaryमुरैना जिले के कैलारस में बंद पड़े सहकारी शक्कर कारखाने को फिर से शुरू करने और उसे बेचने के विरोध में विधायक व किसानों का आमरण-अनशन रविवार को दूसरे दिन भी जारी रहा। अंचल के किसानों ने चेतावनी दी है कि वे ऐतिहासिक मिल की जमीन को बिकने नहीं देंगे और संघर्ष जारी रखेंगे।Categoryदुर्घटनाराजनीतिसमस्या/problemस्थानीयअपराधशिक्षाखेलमनोरंजनव्यापारस्थानीयDistrictNo districtग्वालियरदेशमुरैनाभिंडश्योपुरदतियाशिवपुरीगुनाअशोकनगरAuthorEditorial deskMushtaq Ahmad Khan - Editor In Chiefiuyiuhकृषि डेस्क - कृषि संवाददाताक्राइम डेस्क - अपराध संवाददाताधर्म डेस्क - धर्म संपादकपर्यटन डेस्क - पर्यटन संवाददाताराजनीति डेस्क - राजनीतिक विश्लेषकव्यापार डेस्क - व्यापार संवाददाताशिक्षा डेस्क - शिक्षा संवाददातासंपादकीय डेस्क - वरिष्ठ संपादकसांस्कृतिक डेस्क - सांस्कृतिक संपादकस्पोर्ट्स डेस्क - खेल संवाददाताPublish timeStory URLURL slug/article/morena-story-d9ac224e
StoryWrite in reading order. Add images exactly where they should appear. Text block Image block01Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteमुरैना जिले के कैलारस स्थित ऐतिहासिक 'दि मुरैना मंडल सहकारी शक्कर कारखाना' को पुनः संचालित करने की मांग को लेकर चल रहा विरोध प्रदर्शन और तेज हो गया है। कारखाने को दोबारा शुरू कराने के लिए जनप्रतिनिधियों और स्थानीय किसानों का आमरण-अनशन रविवार को लगातार दूसरे दिन भी जारी रहा। Add text below Add image below02Heading Paragraph Heading Subheading Quoteकिसानों ने खून-पसीने और गहने बेचकर खड़ी की थी मिल Add text below Add image below03Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteइस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे विधायक पंकज उपाध्याय ने जानकारी दी कि इस शक्कर कारखाने की आधारशिला वर्ष 1965 में रखी गई थी। उस दौर में श्योपुर से लेकर भिंड तक के किसानों ने भीषण आर्थिक तंगी के बावजूद अपनी जमीन, मवेशी और यहां तक कि जेवर गिरवी रखकर या बेचकर इसके शेयर खरीदे थे। जब उस समय सोने की कीमत मात्र 180 रुपए प्रति तोला हुआ करती थी, तब अन्नदाताओं और सहकारी समितियों ने अपनी पाई-पाई जोड़कर इस उद्योग को खड़ा किया था। Add text below Add image below04Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteकारखाने में वर्ष 1971-72 के दौरान गन्ने की पिराई का कार्य विधिवत शुरू हुआ, जिससे करीब 15 हजार से अधिक किसान परिवारों और लगभग 2 हजार मजदूरों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला करता था। Add text below Add image below05Heading Paragraph Heading Subheading Quote2011 में महज एक ट्रॉली लकड़ी का बहाना बनाकर बंद कर दी गई थी मिल Add text below Add image below06Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteस्थानीय किसानों और संघर्ष समिति के सदस्यों का आरोप है कि वर्ष 2003 के बाद से ही इस इस कारखाने पर भू-माफियाओं और निहित स्वार्थ वाले लोगों की बुरी नजर पड़ गई थी। वर्ष 2008 में इसे कुछ समय के लिए रोका गया और अंततः 2011 में केवल एक ट्रॉली लकड़ी न मिलने का तुच्छ बहाना बनाकर इसकी स्टीम डाउन कर दी गई। उस वक्त मशीनों के भीतर मौजूद लाखों रुपए मूल्य का गन्ने का रस नाले में बहा दिया गया, और तब से यह उपजाऊ अंचल की यह जीवनरेखा पूरी तरह से ठप पड़ी है। Add text below Add image below07Heading Paragraph Heading Subheading Quoteकरोड़ों की जमीन को औने-पौने दामों में बेचने की साजिश का आरोप Add text below Add image below08Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteआंदोलनकारियों का गंभीर आरोप है कि विभिन्न सरकारों के दौर में नेताओं और मुख्यमंत्रियों ने इस मिल को फिर से चालू करने के केवल खोखले आश्वासन दिए, लेकिन धरातल पर इसे पुनर्जीवित करने के बजाय अब इसे कौड़ियों के भाव बेचने की पटकथा लिखी जा रही है। Add text below Add image below09Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteवर्तमान में इस कारखाने की जिस बेशकीमती जमीन का बाजार मूल्य करीब 450 करोड़ रुपए आंका गया है, उसे महज 61 करोड़ रुपए में एमएसएमई (MSME) विभाग को सौंपने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि इस प्रक्रिया में न तो किसानों के बकाए का भुगतान किया गया है और न ही पुराने श्रमिकों को उनका पूरा हक मिला है। Add text below Add image below10Quote Paragraph Heading Subheading Quoteक्षेत्र में आज भी प्रचुर मात्रा में गन्ने की पैदावार होती है, जिससे आसानी से 5 शक्कर मिलें चलाई जा सकती हैं। किसान और स्थानीय नागरिक इस मिल को किसी भी कीमत पर बिकने नहीं देंगे और सरकार को इसे सहकारिता के माध्यम से फिर से शुरू करने के लिए विवश कर देंगे। Add text below Add image below