Story detailsHeadline, summary, section, and byline.HeadlineSummaryरेलवे में नौकरी के नाम पर करोड़ों की ठगी से जुड़े प्रकरण में ग्वालियर पुलिस के अधिकारियों के खिलाफ विशेष अदालत के संज्ञान को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रारंभिक सुनवाई के दौरान ट्रायल की तरह विस्तृत आदेश पारित नहीं किया जा सकता।Categoryदुर्घटनाराजनीतिसमस्या/problemस्थानीयअपराधशिक्षाखेलमनोरंजनव्यापारस्थानीयDistrictNo districtग्वालियरदेशमुरैनाभिंडश्योपुरदतियाशिवपुरीगुनाअशोकनगरAuthorEditorial deskMushtaq Ahmad Khan - Editor In Chiefiuyiuhकृषि डेस्क - कृषि संवाददाताक्राइम डेस्क - अपराध संवाददाताधर्म डेस्क - धर्म संपादकपर्यटन डेस्क - पर्यटन संवाददाताराजनीति डेस्क - राजनीतिक विश्लेषकव्यापार डेस्क - व्यापार संवाददाताशिक्षा डेस्क - शिक्षा संवाददातासंपादकीय डेस्क - वरिष्ठ संपादकसांस्कृतिक डेस्क - सांस्कृतिक संपादकस्पोर्ट्स डेस्क - खेल संवाददाताPublish timeStory URLURL slug/article/gwalior-story-4f215c1e
StoryWrite in reading order. Add images exactly where they should appear. Text block Image block01Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteग्वालियर अंचल में रेलवे में नौकरी लगवाने के नाम पर करोड़ों रुपये की ठगी से जुड़े बहुचर्चित मामले में फंसे पुलिस अधिकारियों को उच्च न्यायालय से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने विशेष अदालत द्वारा पुलिसकर्मियों के खिलाफ लिए गए संज्ञान के आदेश को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। अदालत का कहना है कि प्रारंभिक चरण की सुनवाई के दौरान विशेष अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसा आदेश पारित कर दिया था, प्रतीत होता है कि मानो पूरे मामले का ट्रायल पहले ही पूरा हो चुका हो। Add text below Add image below02Heading Paragraph Heading Subheading Quoteकिन पुलिस अधिकारियों को मिली राहत Add text below Add image below03Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteइस कानूनी प्रक्रिया में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक राजेश सिंह चंदेल, थाटीपुर थाने के तत्कालीन प्रभारी सुरेंद्र नाथ सिंह यादव, उप निरीक्षक अजय सिंह सिकरवार और आरक्षक संतोष वर्मा द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई की गई। इसके बाद हाईकोर्ट ने 11 मई 2026 को विशेष न्यायाधीश (एमपी डकैती एवं अपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम) द्वारा दिए गए आदेश को खारिज कर दिया। विशेष अदालत ने इन सभी पुलिसकर्मियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 392, 201, 120-बी और एमपीडीवीपीके एक्ट की धाराओं के तहत संज्ञान लिया था। Add text below Add image below04Heading Paragraph Heading Subheading Quoteहाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी Add text below Add image below05Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteसुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल न तो सरकारी कर्मचारियों को संरक्षण देने के लिए किया जा सकता है और न ही जांच अधिकारियों से व्यक्तिगत रंजिश निकालने या बदला लेने का साधन बनाया जा सकता है। सीआरपीसी की धारा 200 और 202 के तहत प्राथमिक सुनवाई के समय अदालत का काम सिर्फ यह देखना होता है कि मामला आगे बढ़ाने लायक प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य हैं या नहीं। इस शुरुआती स्तर पर गवाहों की सत्यता परखने या साक्ष्यों का अंतिम मूल्यांकन करने का अधिकार अदालत को नहीं होता है। Add text below Add image below06Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteअदालत ने यह भी रेखांकित किया कि केवल सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित न रहने मात्र से स्वतः ही साक्ष्य मिटाने (धारा 201) या आपराधिक षड्यंत्र का मामला नहीं बनता। इसके लिए स्पष्ट आपराधिक नीयत और ठोस प्रमाण होने की आवश्यकता होती है। पुलिस अधिकारियों की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील ने दलील दी थी कि सभी अधिकारी अपने आधिकारिक दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे और बिना सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के इस तरह की कानूनी कार्रवाई करना कानून सम्मत नहीं है। Add text below Add image below07Heading Paragraph Heading Subheading Quoteसाल 2023 के ठगी प्रकरण से जुड़ा है पूरा मामला Add text below Add image below08Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteयह पूरा विवाद वर्ष 2023 में थाटीपुर थाने में दर्ज रेलवे भर्ती ठगी कांड से जुड़ा हुआ है। जांच के दौरान शिकायतकर्ता अनूप राणा के भाई विक्रम राणा को मुख्य आरोपी बनाया गया था, और बाद में अनूप राणा की संलिप्तता सामने आने पर उसे भी गिरफ्तार कर लिया गया था। जेल से छूटने के बाद अनूप राणा ने विशेष अदालत में परिवाद दाखिल किया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पुलिस अधिकारियों ने मामले में राहत देने और फर्जी एनकाउंटर की धमकी देकर उससे करीब 30 लाख रुपये की वसूली की है। साथ ही थाने के फुटेज नष्ट करने के आरोप भी लगाए गए थे, जिन्हें अब हाईकोर्ट ने कानूनी रूप से खारिज कर दिया है। Add text below Add image below