Story detailsHeadline, summary, section, and byline.HeadlineSummaryमध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारी माता-पिता के केवल वेतन को आधार बनाकर बच्चों को ओबीसी क्रीमीलेयर के दायरे में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि इसके लिए पद, सेवा श्रेणी और आय के अन्य स्वरूपों का आंकलन करना भी अनिवार्य है।Categoryदुर्घटनाराजनीतिसमस्या/problemस्थानीयअपराधशिक्षाखेलमनोरंजनव्यापारस्थानीयDistrictNo districtग्वालियरदेशमुरैनाभिंडश्योपुरदतियाशिवपुरीगुनाअशोकनगरAuthorEditorial deskMushtaq Ahmad Khan - Editor In Chiefiuyiuhकृषि डेस्क - कृषि संवाददाताक्राइम डेस्क - अपराध संवाददाताधर्म डेस्क - धर्म संपादकपर्यटन डेस्क - पर्यटन संवाददाताराजनीति डेस्क - राजनीतिक विश्लेषकव्यापार डेस्क - व्यापार संवाददाताशिक्षा डेस्क - शिक्षा संवाददातासंपादकीय डेस्क - वरिष्ठ संपादकसांस्कृतिक डेस्क - सांस्कृतिक संपादकस्पोर्ट्स डेस्क - खेल संवाददाताPublish timeStory URLURL slug/article/gwalior-story-31512469
StoryWrite in reading order. Add images exactly where they should appear. Text block Image block01Heading Paragraph Heading Subheading Quoteवेतन सीमा के इतर अन्य मानकों की भी होगी जांच Add text below Add image below02Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteमध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर बेंच ने ओबीसी आरक्षण के तहत आने वाली क्रीमीलेयर व्यवस्था को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि किसी भी सरकारी सेवक की केवल सालाना सैलरी को देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि उसका बच्चा क्रीमीलेयर श्रेणी में आता है या नहीं। Add text below Add image below03Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteइस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह सवाल उठा था कि क्या محض आय सीमा पार होने मात्र से अभ्यर्थी को इस दायरे से बाहर किया जा सकता है। इस पर खंडपीठ ने व्यवस्था दी है कि माता-पिता की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है। Add text below Add image below04Heading Paragraph Heading Subheading Quoteसिविल जज की बेटी के मामले में आया फैसला Add text below Add image below05Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteयह कानूनी विवाद सिविल जज की पुत्री रागिनी राठौर के आवेदन से जुड़ा हुआ है। उनके मामले में पिता का वार्षिक वेतन 16 लाख 99 हजार रुपये होने का हवाला देते हुए आवेदन पर पेंच फंसा था, जिसके बाद मामला अदालत तक पहुंचा। Add text below Add image below06Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteअदालत ने गौर किया कि रागिनी के पिता ने अपनी सेवा की शुरुआत क्लास-II सिविल जज के रूप में की थी और चालीस वर्ष की आयु पूरी होने के पश्चात उन्हें क्लास-I के पद पर पदोन्नति प्राप्त हुई थी। Add text below Add image below07Heading Paragraph Heading Subheading Quoteसेवा श्रेणी और प्रमोशन को मानना होगा आधार Add text below Add image below08Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteहाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि क्रीमीलेयर के निर्धारण के लिए यह देखना बेहद अहम है कि माता-पिता किस सरकारी पद पर नियुक्त हुए थे और उन्हें किस समय प्रमोशन मिला। केवल सैलरी के आंकड़ों को आधार बनाकर प्रशासनिक निर्णय नहीं लिए जा सकते। Add text below Add image below09Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteसर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि वेतन और कृषि भूमि से होने वाली आय को अन्य स्रोतों से प्राप्त आय के साथ मशीनी अंदाज में जोड़कर संपत्ति परीक्षण नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि नियमों का सही पालन होना चाहिए। Add text below Add image below