Story detailsHeadline, summary, section, and byline.HeadlineSummaryगुना जिले के बमोरी क्षेत्र के चार गांवों में घोर गरीबी के चलते मृतकों की अस्थियां वर्षों से विसर्जन का इंतजार कर रही हैं। तंगहाली के कारण वाहन का किराया जुटाना मुश्किल होने से आदिवासी परिवारों को अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है।Categoryदुर्घटनाराजनीतिसमस्या/problemस्थानीयअपराधशिक्षाखेलमनोरंजनव्यापारस्थानीयDistrictNo districtग्वालियरदेशमुरैनाभिंडश्योपुरदतियाशिवपुरीगुनाअशोकनगरAuthorEditorial deskMushtaq Ahmad Khan - Editor In Chiefiuyiuhकृषि डेस्क - कृषि संवाददाताक्राइम डेस्क - अपराध संवाददाताधर्म डेस्क - धर्म संपादकपर्यटन डेस्क - पर्यटन संवाददाताराजनीति डेस्क - राजनीतिक विश्लेषकव्यापार डेस्क - व्यापार संवाददाताशिक्षा डेस्क - शिक्षा संवाददातासंपादकीय डेस्क - वरिष्ठ संपादकसांस्कृतिक डेस्क - सांस्कृतिक संपादकस्पोर्ट्स डेस्क - खेल संवाददाताPublish timeStory URLURL slug/article/guna-story-a0d60f5d
StoryWrite in reading order. Add images exactly where they should appear. Text block Image block01Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteगुना जिले के बमोरी क्षेत्र में सहरिया आदिवासी बहुल गांवों से एक बेहद मार्मिक और झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है। यहां आर्थिक तंगहाली और भयंकर गरीबी इस कदर हावी है कि अपनों को दुनिया से रुखसत करने के बाद भी परिवारों को चैन की नींद और मोक्ष नसीब नहीं हो रहा है। मजदूरी कर जीवनयापन करने वाले इन ग्रामीणों के पास इतने साधन नहीं हैं कि वे अपनों की अस्थियां लेकर अकेले हरिद्वार या प्रयागराज जा सकें। Add text below Add image below02Heading Paragraph Heading Subheading Quoteमजदूरी और रोज की रोजी-रोटी का संकट Add text below Add image below03Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteदैनिक मजदूरी करने वाले इन परिवारों के सामने सबसे बड़ा संकट रोज कमाने और खाने का होता है। यदि कोई एक दिन भी काम छोड़ दे, तो घर में चूल्हा जलना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में अकेले यात्रा करना उनके लिए असंभव सा होता है। जब तक एक साथ आठ से दस परिवारों में ऐसी घटनाएं नहीं हो जातीं, तब तक सामूहिक वाहन का इंतजाम नहीं हो पाता। जब कई परिवार मिलते हैं, तब जाकर वाहन का किराया आपस में बांटा जाता है। Add text below Add image below04Heading Paragraph Heading Subheading Quoteसालों पुराने मामले और पेड़ों के नीचे दबी अस्थियां Add text below Add image below05Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteबर्धा, ग्वारखेड़ा, बरोदिया, बांसखेड़ी और चित्तोड़ा गांवों में की गई पड़ताल के दौरान ऐसे कई मामले सामने आए जहां लोगों की अस्थियां वर्षों से विसर्जन की बाट जोह रही हैं। बरोदिया गांव में 25 साल, ग्वारखेड़ा में 18 साल, तथा बर्धा और बांसखेड़ी में 15-15 साल पुराने मामले देखने को मिले हैं। ग्रामीण मजबूरी में अस्थियों के डिब्बों या बोतलों को सुरक्षित रखने के लिए घरों के पीछे, जंगलों में या नदी के पास पेड़ों के नीचे दबाकर रखते हैं। Add text below Add image below06Heading Paragraph Heading Subheading Quoteपीढ़ियां बदल जाती हैं पर नहीं जुटती राशि Add text below Add image below07Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteचित्तोड़ा निवासी 70 वर्षीय पेमा सहरिया के पिता का देहांत 25 साल पहले हुआ था। गरीबी के कारण वे अब तक अस्थि विसर्जन नहीं कर पाए और खुद वृद्ध हो चुके हैं, जिसके बाद अब उन्होंने यह जिम्मेदारी अपने बेटों को सौंपी है। इसी तरह ग्वारखेड़ा के बृजमोहन की माताजी की अस्थियां एक दशक से नीम के पेड़ के नीचे रखी हुई हैं। Add text below Add image below08Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteखंडेला की रहने वाली मुन्नी बाई के पति का निधन 20 वर्ष पूर्व और उनके बेटे का निधन 5 वर्ष पहले हुआ था। दोनों की एक साथ यात्रा का खर्च उठाने में असमर्थ होने के कारण उन्हें ब्याज पर कर्ज लेना पड़ा, जिसके बाद वे हाल ही में प्रयागराज अस्थियां भेज पाईं। Add text below Add image below09Heading Paragraph Heading Subheading Quoteखो जाने पर मिट्टी के विसर्जन की मजबूरी Add text below Add image below10Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteसहरिया समाज में हरिद्वार की यात्रा को सर्वोपरि माना जाता है। बर्धा के हरलाल महाराज बताते हैं कि यदि लंबे समय तक संभालकर रखने के कारण किसी की अस्थियां सुरक्षित न रहें या खो जाएं, तो उस स्थिति में उस स्थान की पवित्र मिट्टी को ही ले जाकर नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। Add text below Add image below