Story detailsHeadline, summary, section, and byline.HeadlineSummaryदतिया जिला मुख्यालय के पास स्थित खैरी माता मंदिर में मां काली दिनभर में तीन अलग-अलग रूपों में दर्शन देती हैं। इस ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण वर्ष 1658 में महाराजा वीरसिंह जू देव ने कराया था।Categoryदुर्घटनाराजनीतिसमस्या/problemस्थानीयअपराधशिक्षाखेलमनोरंजनव्यापारस्थानीयDistrictNo districtग्वालियरदेशमुरैनाभिंडश्योपुरदतियाशिवपुरीगुनाअशोकनगरAuthorEditorial deskMushtaq Ahmad Khan - Editor In Chiefiuyiuhकृषि डेस्क - कृषि संवाददाताक्राइम डेस्क - अपराध संवाददाताधर्म डेस्क - धर्म संपादकपर्यटन डेस्क - पर्यटन संवाददाताराजनीति डेस्क - राजनीतिक विश्लेषकव्यापार डेस्क - व्यापार संवाददाताशिक्षा डेस्क - शिक्षा संवाददातासंपादकीय डेस्क - वरिष्ठ संपादकसांस्कृतिक डेस्क - सांस्कृतिक संपादकस्पोर्ट्स डेस्क - खेल संवाददाताPublish timeStory URLURL slug/article/datia-story-955876c2
StoryWrite in reading order. Add images exactly where they should appear. Text block Image block01Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteदतिया जिला मुख्यालय से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम खैरी की पहाड़ी पर स्थित खैरी माता मंदिर अंचल के भक्तों के लिए बड़ी आस्था का केंद्र है। इस स्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि यहां स्थापित मां काली दिन के अलग-अलग पहर में अपने तीन रूप बदलती हैं। प्रातःकाल माता बाल रूप में नजर आती हैं, दोपहर के समय उनका युवा स्वरूप दिखाई देता है और शाम ढलते-ढलते वे वृद्ध स्वरूप में भक्तों को दर्शन देती हैं। Add text below Add image below02Heading Paragraph Heading Subheading Quoteखैर के वनों से पड़ा माता का नाम खैरी Add text below Add image below03Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteऊंची पहाड़ी पर बने इस मंदिर के इतिहास के पीछे भी रोचक तथ्य जुड़े हैं। पूर्वकाल में इस पहाड़ी पर खैर के पेड़ों का बहुत घना जंगल हुआ करता था, जिसके चलते मां काली का नाम खैरी माता पड़ गया। कालांतर में पहाड़ी के आसपास बसे गांव का नाम भी खैरी हो गया। यहां दतिया शहर के अलावा दूरदराज के ग्रामीण इलाकों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। खासतौर पर सुबह और शाम के वक्त मंदिर परिसर में भक्तों का तांता लगा रहता है, जो पैदल या वाहनों के जरिए माता के दर्शन के लिए आते हैं। Add text below Add image below04Heading Paragraph Heading Subheading Quoteमहाराजा वीरसिंह जू देव ने की थी स्थापना Add text below Add image below05Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteइतिहास के पन्नों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण कार्य दतिया के महाराजा वीरसिंह जू देव द्वारा वर्ष 1658 में करवाया गया था। उस वक्त इस पहाड़ी को खैरागढ़ के नाम से जाना जाता था। लोक कथाओं के मुताबिक, माता ने दतिया नरेश को स्वप्न के माध्यम से यह जानकारी दी थी कि उनका विग्रह सेंवढ़ा के सनकुआं में मौजूद है। राजा के वहां पहुंचने पर उन्हें विग्रह मिल गया, जिसे वे हाथी-घोड़ों के लाव-लश्कर के साथ दतिया लाए। महल में स्थापना के प्रयास के बाद माता के निर्देश पर राजा ने इस विग्रह को खैरागढ़ की पहाड़ी पर स्थापित किया। Add text below Add image below06Heading Paragraph Heading Subheading Quoteचैत्र नवरात्र के विशेष आयोजन और मेले की परंपरा Add text below Add image below07Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteचैत्र नवरात्र के दौरान यहां तीन दिनों तक विशेष अनुष्ठान होते हैं। सप्तमी तिथि को भद्रकाली का दिन मानते हुए पूरे जिले से श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने और जल चढ़ाने आते हैं। नवमी पर माता को जबारे अर्पित किए जाते हैं और बारस के दिन यहां विशाल मेला भरता है। इस दौरान भक्त मंडलियों के रूप में पहुंचते हैं। कुछ श्रद्धालु गाल में लोहे की सरांग छेदकर कीर्तन करते हुए जबारे चढ़ाने आते हैं। वहीं, शारदीय नवरात्र में मंदिर समिति द्वारा लख्खी भंडारे का आयोजन भी किया जाता है। Add text below Add image below08Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteस्थानीय स्तर पर माता को मनकामेश्वर देवी के रूप में भी पूजा जाता है। उनका यह स्वरूप दुर्गा माई से जुड़ा माना जाता है, जबकि आमजन उनकी आराधना काली माता के रूप में करते हैं। भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होने पर वे मंदिर में भेंट चढ़ाते हैं। जनसहयोग और मंदिर कमेटी के प्रयासों से लगातार यहां विकास कार्य हुए हैं। मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 100 से अधिक सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, और सीढ़ियों पर एक से दो क्विंटल तक वजन वाले कई बड़े घंटे टंगे हुए हैं। Add text below Add image below