Story detailsHeadline, summary, section, and byline.HeadlineSummaryकारगिल के जुवैर हिल पर तिरंगा फहराने वाले भिंड के कैप्टन बादशाह खान ने 27 साल बाद उस जंग के रोमांचक पलों को याद किया है। उन्होंने बताया कि कैसे 5.5 हजार फीट ऊंची बर्फीली पहाड़ी पर 12 घंटे की कठिन चढ़ाई के बाद यह ऐतिहासिक जीत हासिल हुई थी।Categoryदुर्घटनाराजनीतिसमस्या/problemस्थानीयअपराधशिक्षाखेलमनोरंजनव्यापारस्थानीयDistrictNo districtग्वालियरदेशमुरैनाभिंडश्योपुरदतियाशिवपुरीगुनाअशोकनगरAuthorEditorial deskMushtaq Ahmad Khan - Editor In Chiefiuyiuhकृषि डेस्क - कृषि संवाददाताक्राइम डेस्क - अपराध संवाददाताधर्म डेस्क - धर्म संपादकपर्यटन डेस्क - पर्यटन संवाददाताराजनीति डेस्क - राजनीतिक विश्लेषकव्यापार डेस्क - व्यापार संवाददाताशिक्षा डेस्क - शिक्षा संवाददातासंपादकीय डेस्क - वरिष्ठ संपादकसांस्कृतिक डेस्क - सांस्कृतिक संपादकस्पोर्ट्स डेस्क - खेल संवाददाताPublish timeStory URLURL slug/article/bhind-story-d9f72120
StoryWrite in reading order. Add images exactly where they should appear. Text block Image block01Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteकारगिल युद्ध को भले ही दो दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन उस भीषण जंग का हर एक मंजर आज भी आंखों के सामने ताजा हो जाता है। यह कहना है भिंड के रहने वाले कैप्टन बादशाह खान का, जिन्होंने कारगिल की सामरिक रूप से बेहद अहम जुवैर हिल को दुश्मनों के चंगुल से मुक्त कराने की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी। युद्ध की उन यादों को ताजा करते हुए वे बताते हैं कि वह महज एक पहाड़ी पर कब्जे की लड़ाई नहीं थी, बल्कि हर एक कदम पर जिंदगी और मौत का फैसला होना था। Add text below Add image below02Heading Paragraph Heading Subheading Quote12 घंटे की कठिन चढ़ाई और बर्फीले रास्ते Add text below Add image below03Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteस्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने अनुभवों को साझा करते हुए कैप्टन बादशाह खान ने बताया कि उस समय वे 22 ग्रेनेडियर्स में तैनात थे। तत्कालीन लेफ्टिनेंट कर्नल अजीत सिंह के नेतृत्व में चार्ली एचएमसी कंपनी को जुवैर हिल पर फतह हासिल करने का कठिन जिम्मा सौंपा गया था। इस अभियान की शुरुआत शाम पांच बजे की गई थी। लगभग साढ़े पांच हजार फीट ऊंची बर्फीली और खड़ी पहाड़ी पर चढ़ना किसी चुनौती से कम नहीं था। कई स्थानों पर जवानों को केवल रस्सियों के सहारे ऊपर की ओर बढ़ना पड़ा। Add text below Add image below04Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteकड़ाके की ठंड और दुर्गम रास्ते के कारण जवानों के लिए एक-एक कदम बढ़ाना मुश्किल हो रहा था। इस चढ़ाई के दौरान 80 जवानों के दल में से केवल 40 ही जवान ही तय समय पर चोटी तक पहुंच पाए थे। पाकिस्तानी सैनिक पहाड़ी की चोटी से लगातार स्नाइपर फायरिंग कर रहे थे। चारों तरफ गोलियों की सरसराहट के बीच भारतीय जवानों ने बिना रुके लगभग 12 घंटे तक लगातार ऊपर की तरफ मार्च किया। Add text below Add image below05Heading Paragraph Heading Subheading Quoteएक नारे ने बदल दी थी युद्ध की बाजी Add text below Add image below06Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteइस विकट संघर्ष के दौरान एक ऐसा वाकया भी आया जिसने पाकिस्तानी सेना को असमंजस में डाल दिया। भारी गोलाबारी के बीच लेफ्टिनेंट कर्नल अजीत सिंह ने 'नारा-ए-तकबीर' का उद्घोष किया, जिसके जवाब में सभी जवानों ने 'अल्लाह हू अकबर' के नारे लगाए। इस अचानक हुई गूंज से पाकिस्तानी सैनिक कुछ पलों के लिए भ्रमित हो गए और उन्हें लगा कि शायद उनकी अपनी कोई援ी टुकड़ी आ गई है। Add text below Add image below07Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteदुश्मन के खेमे में फैले इसी भ्रम के कुछ पलों ने भारतीय जवानों को संभलने और निर्णायक बढ़त बनाने का शानदार मौका दे दिया। युद्ध के मैदान में ये कुछ सेकंड ही पूरी बाजी पलटने के लिए काफी साबित हुए। Add text below Add image below08Heading Paragraph Heading Subheading Quoteजब खत्म होने लगा था गोला-बारूद Add text below Add image below09Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteजुवैर हिल की इस ऐतिहासिक चढ़ाई के दौरान एक स्थिति ऐसी भी आई जब भारतीय टुकड़ी का गोला-बारूद समाप्त होने की कगार पर पहुंच गया था। हालांकि ऐसी विषम परिस्थितियों में भी सैनिकों और कमांडर ने हौसला नहीं खोया। लेफ्टिनेंट कर्नल अजीत सिंह ने अपनी राइफल की मैग्जीन से गोलियां निकालकर अपनी जेब में रख ली थीं, ताकि जरूरत पड़ने पर उनका सही इस्तेमाल किया जा सके। 18 साथियों का बलिदान और अटूट देशभक्ति के दम पर आखिरकार जुवैर हिल पर तिरंगा फहराकर ही दम लिया गया। Add text below Add image below