Story detailsHeadline, summary, section, and byline.HeadlineSummaryअमर शहीद चंद्रशेखर आजाद ने ब्रिटिश हुकूमत से छिपते हुए मध्यप्रदेश के दतिया में रहकर पिस्टल चलाने का प्रशिक्षण लिया था। वे झांसी से साइकिल चलाकर दीवान नाहर सिंह बुंदेला के पास आते थे और मिस्त्री साहब के नाम से पहचाने जाते थे।Categoryदुर्घटनाराजनीतिसमस्या/problemस्थानीयअपराधशिक्षाखेलमनोरंजनव्यापारस्थानीयDistrictNo districtग्वालियरदेशमुरैनाभिंडश्योपुरदतियाशिवपुरीगुनाअशोकनगरAuthorEditorial deskMushtaq Ahmad Khan - Editor In Chiefiuyiuhकृषि डेस्क - कृषि संवाददाताक्राइम डेस्क - अपराध संवाददाताधर्म डेस्क - धर्म संपादकपर्यटन डेस्क - पर्यटन संवाददाताराजनीति डेस्क - राजनीतिक विश्लेषकव्यापार डेस्क - व्यापार संवाददाताशिक्षा डेस्क - शिक्षा संवाददातासंपादकीय डेस्क - वरिष्ठ संपादकसांस्कृतिक डेस्क - सांस्कृतिक संपादकस्पोर्ट्स डेस्क - खेल संवाददाताPublish timeStory URLURL slug/article/datia-story-2fa7c34c
StoryWrite in reading order. Add images exactly where they should appear. Text block Image block01Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteभारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नायक अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद का मध्यप्रदेश के चंबल-ग्वालियर अंचल से गहरा नाता रहा है। इतिहास के पन्नों के अनुसार, आजाद ने दतिया की धरती पर रहकर ही पिस्टल से अचूक निशानेबाजी करने की कला में महारथ हासिल की थी। उन दिनों दतिया क्षेत्र कुशल निशानेबाजों और रियासती रियायतों के लिए विशेष पहचान रखता था। Add text below Add image below02Heading Paragraph Heading Subheading Quoteकाकोरी कांड के बाद बुंदेलखंड में बिताया था अज्ञातवास Add text below Add image below03Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteलखनउ के पास 9 अगस्त 1925 को हुए काकोरी ट्रेन एक्शन में सरकारी खजाना लूटे जाने के बाद ब्रिटिश पुलिस ने चंद्रशेखर आजाद और उनके साथियों की धरपकड़ तेज कर दी थी। अंग्रेजों की दबिश से बचने के लिए आजाद अपने साथियों से अलग होकर बुंदेलखंड पहुंचे और अपनी पहचान बदलकर झांसी व ओरछा में रहकर संगठन को मजबूत करने लगे। वे यहीं से अंग्रेजी हुकूमत की हर हरकत पर कड़ी नजर रखते थे। Add text below Add image below04Heading Paragraph Heading Subheading Quoteदीवान नाहर सिंह बुंदेला से सीखते थे निशानेबाजी के गुर Add text below Add image below05Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteकरीब 1929 के आसपास का यह वाकया है, जब दतिया नरेश महाराजा गोविंद सिंह की गिनती बेहतरीन निशानेबाजों में होती थी। उस दौर में दतिया रियासत के दीवान नाहर सिंह बुंदेला ने चंद्रशेखर आजाद को गुप्त रूप से अपने यहां आश्रय दिया। दीवान साहब के वंशज बताते हैं कि अज्ञातवास के दौरान आजाद ने अपनी निशानेबाजी को और धार देने के लिए उनके पूर्वजों से संपर्क साधा था। इसके बाद वे अक्सर झांसी से उनाव के रास्ते साइकिल के जरिए दतिया पहुंच जाते थे। Add text below Add image below06Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteदतिया आने पर वे एक विशेष हवेली में ठहरते थे, जिसे वर्तमान में गुगोरिया विश्व शांति भवन के नाम से जाना जाता है। यहां वे दीवान नाहर सिंह से गुप्त रूप से पिस्टल चलाने का अभ्यास करते और फिर झांसी लौट जाते। झांसी में उन्हें मास्टर रुद्र नारायण सिंह का भी संरक्षण प्राप्त था। जब भी झांसी में ब्रिटिश सीआईडी और पुलिस की गश्त बढ़ती, आजाद सुरक्षित ठिकाने के रूप में दतिया आ जाते थे। Add text below Add image below07Heading Paragraph Heading Subheading Quoteअर्दलियों के बीच 'मिस्त्री साहब' के नाम से थे लोकप्रिय Add text below Add image below08Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteदीवान साहब के अर्दली रहे देव सिंह खबास और मोहन सिंह उन्हें 'मिस्त्री साहब' कहकर पुकारते थे। उन दिनों रियासतों की हवेलियों में शस्त्रों का होना आम बात थी और उनकी मरम्मत भी होती रहती थी। इसलिए किसी को शक नहीं हुआ कि हथियारों के बीच रहने वाले यह मिस्त्री साहब असल में देश के सबसे बड़े क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद हैं। फरवरी 1931 में इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में शहादत के बाद जब अखबारों में उनकी तस्वीरें छपीं, तब इन अर्दलियों ने अपने यहां रहने वाले मिस्त्री साहब को पहचाना था। Add text below Add image below09Paragraph Paragraph Heading Subheading Quoteवह पुरानी हवेली आज भी उस दौर की यादों को सहेजे हुए है जहां आजाद ने छिपकर शरण ली थी और बंदूक चलाने का अभ्यास किया था। इसके अलावा बसई और खनियांधाना रियासत से जुड़े संस्मरण भी उनके क्रांतिकारी जीवन के संघर्षों और गुप्त प्रवास की गवाही देते हैं, जहां राजा खलक सिंह जू देव से उनकी गहरी घनिष्ठता हो गई थी। Add text below Add image below